पटना में सफाई के लिए हर महीने ₹28 करोड़ खर्च, फिर भी गलियों से सड़कों तक कचरे का ढेर; दिक्कत क्या है?
पटना में हर महीने 28 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद सड़कों पर कचरे का अंबार लगा है, जिसका मुख्य ...और पढ़ें

पाटलिपुत्र औद्योगिक परिसर में सड़क किनारे डंप किया गया कूड़ा। जागरण
HighLights
हर महीने 28 करोड़ खर्च, फिर भी पटना में कचरा।
नगर निगम के 40% वाहन खराब, नए खरीद में देरी।
शहरवासी परेशान, कचरा उठाव में गंभीर समस्या।
मनीष कुमार, पटना। बिहार की राजधानी पटना में सफाई पर हर महीने 28 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद गलियों से सड़कों तक पर कचरे का अंबार। कचरा उठाव की व्यवस्था वाहनों की कमी से बेपटरी होती जा रही है।
नगर निगम के 40 प्रतिशत वाहन खराब हैं, जबकि 350 नए वाहनों की खरीद की योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है। इसका खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। कहीं दोपहर तक कचरे का ढेर लगा रहता है, तो कहीं घरों से कचरा उठाने वाले वाहन कई दिनों तक नहीं पहुंचते।
शिकायत करने के बाद भी कई जगहों पर समय पर कचरा नहीं उठाया जा रहा है। गलियों में खाली पड़े निजी प्लाट भी कचरे के डंपिंग प्वाइंट बनते जा रहे हैं। बंद किए गए कचरा प्वाइंट फिर से डंपिंग जोन में तब्दील होते जा रहे हैं।
राजधानी के सभी 75 वार्डों में सफाई व्यवस्था के लिए प्रत्येक वार्ड को पांच सेक्टर में बांटा गया है। हर सेक्टर में एक क्लोज टिपर से कचरा उठाव की व्यवस्था होनी चाहिए। इस हिसाब से 375 क्लोज टिपर की जरूरत है, जबकि फिलहाल 336 से ही काम चलाया जा रहा है। शेष वाहन खराब हैं।
राजधानी से सामान्य दिनों में प्रतिदिन औसतन एक हजार टन कचरा निकलता है। दीपावली और छठ महापर्व के मद्देनजर कचरे बोझ सामान्य दिनों की तुलना में 20 प्रतिशत तक बढ़ा हुआ है। ऐसे में वाहनों की कमी का असर सीधे कचरा उठाव पर पड़ रहा है।
योजना बनी पर नहीं खरीदे गए नए वाहन
बढ़ती आबादी और कचरे की मात्रा को देखते हुए निगम ने 350 नए वाहनों की खरीद की योजना बनाई थी। सशक्त स्थायी समिति और निगम पर्षद से स्वीकृत प्रस्ताव के तहत 150 ई-रिक्शा, 150 क्लोज टिपर, 45 ओपन टिपर, तीन मिनी पोकलेन और दो सुपर सकर मशीनें खरीदी जानी थीं। इसके लिए निविदा भी जारी की गई थी।
हालांकि, नगर विकास एवं आवास विभाग ने एकीकृत माडल आरएफपी के तहत खरीदारी करने का निर्देश देते हुए प्रक्रिया रोक दी। इस प्रक्रिया के ही छह माह बीत गए। अब निगम प्रस्तावित आरएफपी को लागू करने की दिशा में काम कर रहा है।
नई व्यवस्था के लागू होने में कम से कम दो से तीन माह का समय लगेगा। चार साल की सफाई व्यवस्था पर 1,186.07 करोड़ (हर माह 24.70 करोड़) खर्च होंगे। इसमें तीन-तीन अंचलों के लिए चयनित दो एजेंसियां ही वाहन खरीद करेगी।
152 जर्जर वाहनों की नीलामी भी लंबित
निगम के पुराने और जर्जर वाहनों को हटाने की योजना भी पूरी नहीं हो सकी है। करीब एक साल पहले 158 पुराने वाहनों की सूची तैयार की गई थी। इनमें से 152 वाहनों को कंडम घोषित कर नीलाम करने का निर्णय लिया गया।
इसके लिए न्यूनतम मूल्य 82.56 लाख रुपये तय किया गया था। निर्धारित मूल्य नहीं मिलने के कारण नीलामी की प्रक्रिया अब तक लंबित है।
बेहतर सफाई के लिए वार्डवार वाहनों की जरूरत
| वाहन | प्रत्येक वार्ड में | कुल वाहन |
|---|---|---|
| क्लोज टिपर | 5 | 375 |
| ओपन टिपर | 1 | 75 |
| ई-रिक्शा | 5 | 375 |
| हाथ ठेला | 10 | 750 |
| बाब कैट | 1 | 75 |
| जेसीबी | 1 | 75 |
| हाइवा | 2 | 150 |
इन वाहनों की भी जरूरत
| वाहन | कुल |
|---|---|
| स्ट्रीट स्वीपर | 17 |
| कचरा काम्पैक्टर | 35 |
| हुक लोडर | 35 |
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