Panta City History: गोलघर के आगे खत्म हो जाता था पटना, 1912 के बाद बेकार जमीन में कैसे हुआ शहर का विकास?
पटना शहर का विकास 1912 में बिहार-ओडिशा प्रांत के गठन के बाद शुरू हुआ, जब यह खुली जमीन से आधुनिक राजधानी में बदला।

पटना का इतिहास। फोटो जागरण
HighLights
1912 में बिहार-ओडिशा प्रांत गठन से पटना का विकास शुरू हुआ।
हाईकोर्ट और पटना विश्वविद्यालय ने शहर को नई पहचान दी।
नियोजित कॉलोनियों ने पटना को आधुनिक शहरी स्वरूप प्रदान किया।
जागरण संवाददाता, पटना। आज जहां सचिवालय की हलचल है, हाईकोर्ट की भव्य इमारत खड़ी है और विश्वविद्यालय की घंटियां शहर की बौद्धिक पहचान बनाती हैं, वहां कभी खुली जमीन और परती खेत हुआ करते थे।
पटना तब इतना फैला हुआ शहर नहीं था। पुरानी बस्तियों, गंगा किनारे के बाजारों और मोहल्लों से गुजरते हुए शहर गोलघर तक आते-आते सुनसान पड़ जाता था।
1911 में राजधानी परिवर्तन की घोषणा हुई और 1912 में बिहार-ओडिशा प्रांत के गठन के साथ पटना के लिए इतिहास का नया अध्याय खुला।
राजधानी के रूप में विकसित करने के लिए बांकीपुर मौजे की जमीन चुनी गई और यहीं से आधुनिक पटना के विस्तार की कहानी शुरू हुई।
राजधानी के लिए केवल सरकारी दफ्तर खड़े करना पर्याप्त नहीं था। जरूरत थी सड़कों, न्यायिक संस्थान, शिक्षण केंद्र और आवासीय इलाकों वाले एक नए शहर की।
अंग्रेजी शासन ने इसके लिए बाकायदा शहरी ढांचे की रूपरेखा तैयार की। आने वाले वर्षों में ऐसी इमारतें और संस्थान बने, जिनकी छाप आज भी पटना की पहचान में दिखाई देती है।
हाईकोर्ट की इमारत बनी स्थापत्य की पहचान
नए राजधानी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण इमारतों में पटना हाईकोर्ट शामिल था। मार्टिन बर्न एंड कंपनी ने इसका निर्माण किया। पैलाडियन और क्लासिकल शैली में बनी इस इमारत का उद्घाटन 3 फरवरी 1916 को हुआ।
भव्य स्थापत्य वाली इस इमारत ने पटना को प्रशासनिक केंद्र के साथ न्यायिक महत्व भी दिया। इसके आसपास सचिवालय और दूसरे सरकारी भवन विकसित होने लगे। चौड़ी सड़कों और बड़े परिसरों ने पुराने शहर से अलग एक नए प्रशासनिक क्षेत्र का स्वरूप तैयार किया।
1917 में खुला शिक्षा का नया द्वार
राजधानी बनने के बाद पटना में विश्वविद्यालय की जरूरत भी महसूस हुई। इसके लिए भारतीयों और अंग्रेज अधिकारियों की 18 सदस्यीय नाथन कमेटी गठित की गई।
समिति ने 1913 में लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर विश्वविद्यालय स्थापित करने की सिफारिश की। 1917 में पटना विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
शुरुआत में तीन सरकारी, पांच अनुदानित और एक व्यावसायिक कॉलेज इससे जुड़े। विश्वविद्यालय ने पटना की पहचान को सरकारी राजधानी से आगे बढ़ाया। शहर में शिक्षा, बहस और बौद्धिक गतिविधियों का नया वातावरण बनने लगा।
सुल्तान पैलेस में दिखी निजी शान
राजधानी के विस्तार के साथ निजी भव्य भवन भी शहर की पहचान बनने लगे। वीरचंद पटेल पथ पर स्थित सुल्तान पैलेस 1922 में तैयार हुआ। पटना विश्वविद्यालय के पहले भारतीय कुलपति और प्रसिद्ध वकील सर सुल्तान अहमद ने इसका निर्माण कराया था।
इंडो-सारसेनिक शैली के इस भवन में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल हुआ। नक्काशी के लिए बनारस से कारीगर बुलाए गए और निर्माण पर उस समय करीब 22 लाख रुपये खर्च हुए।
डाकबंगला चौराहे के पास रिजवान कैसल भी उसी दौर की स्थापत्य विरासत का हिस्सा है। ब्रिटिश-स्काटिश शैली की इस इमारत का निर्माण प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता सेनानी हसन इमाम ने कराया था। 1912 के कांग्रेस अधिवेशन के मेहमानों की मेजबानी से इसका जुड़ाव भी बताया जाता है।
अशोक राजपथ से जुड़ा शहर और गांव
उस समय पटना की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में अशोक राजपथ था। यह पटना सिटी से दानापुर कैंट तक जाने वाली प्रमुख राह थी। इसके किनारे शहर और गांव की मिली-जुली तस्वीर दिखती थी।
बांकीपुर के आसपास लोहानीपुर, मीठापुर, यारपुर, लोदीपुर, राजापुर-मैनपुरा और बहादुरपुर जैसे इलाकों में बड़े किसान रहते थे।
बैलगाड़ियों पर अनाज लादकर बाजार पहुंचाना आम दृश्य था। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आधुनिक राजधानी के विस्तार के बीच पटना की ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी गहराई से मौजूद थी।
कदमकुआं-चिरैयाटांड़ से बढ़ी बस्ती
नए शहर के साथ आवासीय जरूरतें भी बढ़ीं। 1934-35 के आसपास कदमकुआं, चिरैयाटांड़ और पटना सिटी के टिकिया टोली में खास महल की जमीन लीज पर आवंटित की गई। धीरे-धीरे यहां मकान बने और शहर का फैलाव पुरानी सीमाओं से आगे बढ़ा।
तब निर्माण की तकनीक भी अलग थी। 1950 से पहले ज्यादातर मकान ओपन फाउंडेशन पर बनते थे और दो मंजिल से ऊंचे भवन कम ही होते थे। आजादी के बाद बने नए सचिवालय की तीन मंजिला इमारत भी बिना पाइलिंग के तैयार की गई थी।
राजेंद्रनगर से आया योजनाबद्ध विस्तार
1954 में पटना इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट बनने के बाद शहर के नियोजित विकास को संस्थागत आधार मिला। 1960 में राजेंद्रनगर और श्रीकृष्णापुरी जैसी कॉलोनियां विकसित की गईं।
राजेंद्रनगर का नाम प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और श्रीकृष्णापुरी का नाम बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की स्मृति में रखा गया।
बाद में पाटलिपुत्र कालोनी जैसे इलाके भी शहर के विस्तार में जुड़े। इस तरह पटना की कहानी केवल राजधानी बनने की कहानी नहीं है।
यह परती जमीन से शहर बनने, पुराने मोहल्लों से नई कालनियों तक पहुंचने और प्रशासनिक केंद्र से शिक्षा-न्याय की राजधानी बनने की कहानी है।
आज ऊंची इमारतों और व्यस्त सड़कों के बीच भले ही खेत और खुली जमीन दिखाई न दें, लेकिन शहर की कई बस्तियों और इमारतों में उस पुराने पटना की स्मृतियां अब भी सुरक्षित हैं।
1912 के बाद खिंची विकास की पहली लकीरें ही आगे चलकर उस पटना का नक्शा बनीं, जिसे आज हम अपनी राजधानी के रूप में जानते हैं।
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