पटना [अरविंद शर्मा]। बिहार में महागठबंधन के प्रमुख घटक दलों की अदावत अपने सियासी प्रतिद्वंद्वियों से कम और दोस्तों से ज्यादा है। नेतृत्व की कमी, अवसरवादिता और संवादहीनता ने सबकी राहें तकरीबन जुदा कर दी हैं। तीन तलाक और जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर केंद्र सरकार के फैसले के बाद घटक दलों के अलग-अलग स्टैंड ने फासले को और बढ़ा दिया है। महागठबंधन के एक प्रमुख सहयोगी और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने तो नाता-रिश्ता भी खत्म करने का ऐलान कर दिया है। स्पष्ट है कि लालू प्रसाद ने राजद के नेतृत्व में जिस मकसद से बिहार में भाजपा और जदयू विरोधी दलों का एक मंच बनाया था, वह मंजिल पर पहुंचने के पहले ही बिखरता नजर आ रहा है। 

सबके अपने-अपने स्‍टैंड

राजद का शीर्ष नेतृत्व अपने घरेलू मोर्चे पर ही उलझा हुआ है। कांग्रेस को महागठबंधन कहीं नजर नहीं आ रहा है। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने अन्य साथी दलों से दूरी बना ली है। जीतनराम मांझी ने दोस्ती का बंधन तोड़कर राजद और कांग्रेस पर सियासी ठगी का आरोप लगा दिया है। रालोसपा अपनी ही दुनिया में मस्त-व्यस्त है। लोकसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले बनी विकासशील इंसान पार्टी (वीआइपी) के प्रमुख का वास्ता राजनीति से कम और व्यवसाय से ज्यादा है। जाहिर है, भाजपा-जदयू के विरोध में पांच सियासी दल बिहार की सत्ता पर कब्जे का जो ख्वाब देख रहे थे, वह पूरा नहीं हो सका तो सबकी गांठें लगभग खुल चुकी हैं। 

 

न बात-न मुलाकात, कैसी एकता 

ताजा हालात बता रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद सबके हौसले पस्त हो चुके हैं। हार की समीक्षा के लिए संयुक्त समिति बनाने की बात थी, जो हवा में ही रह गई। महागठबंधन के घटक दलों की एक मीटिंग तक नहीं हो पाई। यहां तक कि विधानसभा के मानसून सत्र के पहले संयुक्त विपक्ष की मीटिंग की औपचारिकता भी पूरी नहीं की जा सकी। सदन में भी सबके सुर-ताल अलग-अलग ही रहे। मांझी ने तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल खड़ा कर दिया। फिर भी राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी को यह सब आपसी मसला नजर आता है। वह यह तो स्वीकार करते हैं कि महागठबंधन में झंझट है। कोई जबरन बाहर जाना चाहेगा तो क्या किया जा सकता है, लेकिन बकौल शिवानंद, लालू प्रसाद से महज एक बार की बात-मुलाकात से सारे पेंच सुलझा लिये जाएंगे। मांझी का मसला भी कोई बड़ा नहीं है। 

समस्या के मूल में राजद-कांग्रेस

महागठबंधन में सारी समस्याओं के मूल में राजद और कांग्रेस को बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव हारने के बाद से दोनों पार्टियां पस्त नजर आ रही हैं। कांग्रेस की समस्या राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर है। दिल्ली का कमांडर तय होने के बाद ही पटना में भी कुछ हलचल शुरू होगी। राजद के उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव का अज्ञातवास कुछ ज्यादा ही लंबा हो रहा है। कोई सर्वमान्य नेता नहीं तो कार्यक्रम भी नहीं। कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी कहते हैं कि दोस्ती का मतलब है मेल-मिलाप। जब आपस में मिलना-जुलना ही नहीं होता है तो दोस्ती कैसी। न लोकसभा चुनाव के पहले हम मिल रहे थे, न हारने के बाद मिल रहे हैं। फिर भी गठबंधन का दावा कर रहे हैं तो इससे बड़ा झूठ नहीं हो सकता है। 

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Posted By: Rajesh Thakur

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