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राज्यसभा की राह या सियासी ‘स्क्रिप्ट’? 10 सभाओं में चुप रहे नीतीश, क्या जबरन हो रहा है ‘दिल्ली शिफ्ट’ का खेल

Published: Thu, 19 Mar 2026 08:37 AM (IST)

नीतीश कुमार की 'समृद्धि यात्रा' के अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद उनके राजनीतिक भविष्य पर अनिश्चितता बनी हुई है। ...और पढ़ें

HighLights

  1. नीतीश कुमार की 'समृद्धि यात्रा' में भविष्य पर चुप्पी।

  2. राज्यसभा जाने या नई भूमिका पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं।

  3. जदयू 'मार्गदर्शक' भूमिका चाहती, भाजपा नेतृत्व का भरोसा।

डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar की ‘समृद्धि यात्रा’ अब अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है, लेकिन उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस और गहराता जा रहा है। 16 जनवरी से शुरू हुई इस यात्रा में वे राज्य के अधिकांश हिस्सों का दौरा कर चुके हैं। इसके बावजूद, राज्यसभा जाने के फैसले पर उनकी चुप्पी ने नई बहस छेड़ दी है।

भाषणों में विकास, पर भविष्य पर मौन

करीब 10 जिलों में जनसभाएं करने के बावजूद उन्होंने एक बार भी बिहार छोड़ने या नई भूमिका को लेकर खुलकर कुछ नहीं कहा।

हर मंच से वे विकास कार्यों, योजनाओं और अपनी सरकार की उपलब्धियों का ही ब्योरा देते रहे। सवाल यह है कि क्या यह सियासी रणनीति है या अनिश्चितता का संकेत?

राज्यसभा की पारी या ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका

जदयू के भीतर से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बताते हैं कि पार्टी चाहती है कि नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से हटकर ‘मार्गदर्शक’ की भूमिका निभाएं।

लेकिन क्या यह बदलाव स्वाभाविक है या परिस्थितियों से उपजा निर्णय, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।

बीजेपी का संतुलित संदेश

डिप्टी सीएम Samrat Choudhary समेत बीजेपी नेताओं के बयान भी दिलचस्प हैं। वे लगातार यह दोहराते रहे हैं कि आगे भी सरकार नीतीश के नेतृत्व में ही चलेगी।

यह संदेश एक तरह से स्थिरता दिखाने की कोशिश है, लेकिन इससे नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाएं भी झलकती हैं।

मंच की ‘बॉडी लैंग्वेज’ से सियासी संकेत

सहरसा में सम्राट चौधरी के कंधे पर हाथ रखकर जनता से समर्थन दिलाने की अपील को कई लोग उत्तराधिकार के संकेत के रूप में देख रहे हैं।

हालांकि जानकार इसे सिर्फ एक ‘राजनीतिक मुद्रा’ मानते हैं। फिर भी, इस तरह के दृश्य सियासी गलियारों में चर्चाओं को हवा दे रहे हैं।

जदयू में भावनाएं, भाजपा में आश्वासन

जदयू नेताओं की भावुक प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत देती हैं कि पार्टी के भीतर असमंजस और भावनात्मक जुड़ाव दोनों मौजूद हैं।

वहीं बीजेपी नेतृत्व बार-बार यह भरोसा दिला रहा है कि अंतिम फैसला नीतीश कुमार का ही होगा और उनकी नीतियों पर ही सरकार आगे बढ़ेगी।

सवालों के घेरे में ‘चुप्पी’ की राजनीति

वरिष्ठ पत्रकारों की राय भी इस मुद्दे को और जटिल बनाती है। कुछ इसे सियासी संतुलन बनाए रखने की रणनीति मानते हैं, तो कुछ इसे नेतृत्व की सीमित होती भूमिका के संकेत के तौर पर देखते हैं।

निष्कर्ष: संकेत कई, स्पष्टता शून्य

कुल मिलाकर, नीतीश कुमार की यात्रा जितनी भौगोलिक रूप से व्यापक रही है, उतनी ही राजनीतिक रूप से अस्पष्ट भी। राज्यसभा जाना तय है या नहीं, इसके पीछे की रणनीति क्या है, इन सवालों का जवाब फिलहाल उनकी चुप्पी में ही छिपा है।

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