पटना [अरुण अशेष]। संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने की किसी कोशिश का विरोध कर जदयू ने साफ कर दिया है कि वह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक हैसियत को लेकर सतर्क है। यह अलग बात है कि जदयू के इस रुख का कोई असर भाजपा के रिश्ते पर नहीं पडऩे जा रहा है। साझे में सरकार भी चल रही है। लोकसभा चुनाव भी साथ लड़े जाएंगे। सबकुछ साझा होगा, लेकिन, विवादास्पद मुद्दों पर जदयू समझौता नहीं करेगा। इसकी रह-रहकर नीतीश कुमार याद दिलाते रहते हैं। यह मूल एनडीए का करार है। वह अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के समय एनडीए के घटक दलों के बीच हुआ था। 

नहीं कर सकते हैं कुछ मुद्दों पर समझौता

जदयू के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व सांसद केसी त्यागी कहते हैं- आज के दौर में जदयू समाजवादी विचारधारा की अंतिम पार्टी है। हमारे अपने सिद्धांत हैं। उनके प्रति हमारी प्रतिबद्धता है। इनसे समझौता नहीं किया जा सकता है। एनडीए का गठन कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था। उस समय विभिन्न दलों के अन्य एजेंडे शिथिल कर दिए गए थे। आज भी इस नीति में बदलाव नहीं आया है। 

धारा 370 ही क्यों?

धारा 370 ही क्यों? भाजपा के कई घोषित एजेंडे का जदयू विरोध करता रहा है। राम मंदिर, तीन तलाक, समान नागरिक कानून और असमी नागरिकता का सवाल-ये ऐसे विषय हैं, जिन पर जदयू का रुख भाजपा से सिर्फ अलग ही नहीं, उसके विरोधियों के समकक्ष रहा है। असम के मामले में तो जदयू दो कदम आगे बढ़ कर असम गण परिषद के साथ खड़ा है, जो भाजपा से अपना समर्थन वापस ले चुका है। अगप के नेताओं से जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अच्छे रिश्ते हैं। 

यह स्वतंत्र पहचान बनाए जाने की जिद थी

भाजपा से गहरी दोस्ती के समय भी जदयू ने राष्ट्रपति चुनाव के समय उसके उम्मीदवार का विरोध किया था। यह स्वतंत्र पहचान को बनाए रखने की जिद थी कि राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद के निर्वाचन के समय जदयू ने उनके पक्ष में मतदान किया। जबकि, उस समय जदयू महागठबंधन का हिस्सा था। पूर्व सांसद मीरा कुमार कांग्रेस की उम्मीदवार थीं। राज्य में कांग्रेस की मदद से सरकार चल रही थी। जदयू ने मीरा कुमार के पक्ष में मतदान नहीं किया। 

नोटबंदी का समर्थन, सब चौंक गए थे

जदयू ने नोटबंदी का समर्थन कर सबको चौंका दिया था। उस दौर में भाजपा विरोधी सभी पार्टियां नोटबंदी का विरोध कर रही थीं। राज्य में महागठबंधन की सरकार का नेतृत्व करने के कारण नीतीश कुमार भी इसी खेमे में थे। लेकिन, उन्होंने नोटबंदी पर भाजपा की लाइन का समर्थन किया। इसी तरह पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक के पक्ष में भी वह खड़े हुए। 

नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं

बेशक, नीतीश कुमार भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री बने। फिर भी सरकार पर कभी भाजपा का घोषित एजेंडा लागू नहीं हो पाया। कब्रिस्तानों की घेराबंदी हो या अल्पसंख्यकों के कल्याण की विशेष योजनाएं, नीतीश के किसी फैसले में भाजपा ने अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का राग नहीं अलापा। यह शायद इसलिए भी संभव हो पाया, क्योंकि राज्य सरकार की ज्यादा योजनाएं किसी खास वर्ग के लिए नहीं, बल्कि सबके लिए हैं। शमशान के साथ साथ कब्रिस्तान की भी घेराबंदी कराई गई।

Posted By: Rajesh Thakur

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