पटना। बेहद गंभीर और नपी तुली बातें करने वाले नीतीश कुमार अपने साधारण और ईमानदार व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं। बिहार की जनता के बीच सुशासन बाबू की छवि वाले नीतीश कुमार का जीवन काफी संघर्ष भरा रहा है लेकिन उन्होंने कभी भी अमर्यादित और अनैतिक भाषा का प्रयोग नहीं किया।

धैर्य और सोच समझकर अपना फैसला लेने वाले नीतीश ने कई अग्निपरीक्षाएं दी हैं। राजनीतिक जीवन की उठा पटक ने उन्हे लोहे सा मजबूत बनाया और अपने आत्मविश्वास और धैर्य की बदौलत ही वे आज फिर से इतिहास रचने जा रहे हैं। उनके राजनीतिक सफर की कुछ बातें जिन्होंने उन्हें बहुत कुछ सिखाया, आइए जानते हैं एेसी कौन सी बाते थीं जिन्हेोंने नीतीश कुमार को फौलाद सा मजबूत और दृढ़संकल्रपी बनाया।

  • नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जनता पार्टी के साथ शुरु की। १९७७ में जब देश में जनता पार्टी की सरकार थी उस वक्त पार्टी से विधानसभा का चुनाव लड़ने के बाद नीतीश चुनाव हार गए थे फिर १९८० मे भी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने उन्हें काफी कुछ सिखाया।
  • घर की आर्थिक स्थिति के कारण राजनीति छोड़कर उन्हें नौकरी करने का पारिवारिक दबाव भी झेलने पड़े इसके बावजूद उन्होंने नौकरी न करने काे अपने दृढ़संकल्प पर कायम रहे।
  • उसके बाद का उनका जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। नौकरी नही कोई पूछने वाला नहीं । अपने घर से वे ट्रेन से पटना आते थे और पैदल ही घूमते थे।
  • नीतीश कुमार के पिता जी जो सतेंद्र नारायण सिन्हा के बेहद करीबी थे लेकिन उन्होंने यह कभी नहीं बताया कि उनका बेटा भी राजनीति में हैं। जब सत्येंद्र नारायण सिन्हा 1985 में नीतीश के प्रचार के लिए इलाके में पहुंचे तब उन्हें यह बात पता चली।
  • नीतीश कुमार फिर से 1985 में विधानसभा चुनाव लड़े और विजयी रहे और 1987 में वे युवा लोकदल के अध्यक्ष बने।
  • फिर नीतीश कुमार 1989 जनता दल के प्रदेश सचिव बने और इसी दौरान उन्होंने लोकसभा चुनाव मे जीत दर्ज की।
  • 1995 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की समता पार्टी चुनाव लड़ी लेकिन बुरी तरह हार गई। नीतीश की पार्टी के लोग इधर-उधर चले गए लेकिन नीतीश के हौसले में कोई कमी नही आई।
  • अगस्त 1999 में गैसल में हुई रेल दुर्घटना के बाद नीतीश कुमार ने रेल मंत्री पद छोड़ दिया। इसके बाद 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बादउन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
  • नीतीश कुनार ने 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली लेकिन सात दिनों के भीतर ही उन्हे इस्तीफा देना पड़ा।
इन तमाम बातों ने नीतीश कुमार के इरादे को कभी डगमगाने नहीं दिया और उनका यही धैर्य और दृढसंकल्प आज नीतीश कुमार के रुप में सामने है।

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