पटना [सुनील राज]। बकौल रामोला नंदी, कलम मेरे हाथों में है। दिमाग सालों पहले की स्मृति में सफर कर रहा है। यह सफर कॉलेज के कॉरिडोर में जाकर रुकता है। साफ सुथरे कॉलेज के क्लास रूम, उसकी दीवारों सेलगे काले रंग के ब्लैकबोर्ड।

 

पूर्वोत्तर दिशा का कॉरिडोर से लगती वो लॉन और उसकी वो हरी-हरी घास कुछ सुंगधित फूल। दरअसल यह शिक्षा का मंदिर है। जिसे याद करते हुए दिमाग एक बार फिर जवान हुआ जाता है।

 

सही मायने में यह सिर्फ रामोला नंदी के अहसास नहीं। अहसास हैं हर उस शिक्षक के उस छात्र के जिन्होंने अपनी जवानी का स्वर्णिम समय पटना विश्वविद्यालय में बिताया है और यहां की हर एक चीज को जिया है। रामोला नंदी मगध महिला कॉलेज की प्राचार्य रहीं और बाद के कालखंड में वे पटना विवि की कुलपति भी रहीं। 

 

गंगा किनारे शांत भाव से खड़े पटना विश्वविद्यालय ने अपने जीवन के सौ वसंत देख लिए। अपने इस सफर में उसने सिर्फ पाया है। कुछ मामूली चीजें खोई हैं, जो कभी कभार याद आ जाती हैं। इस विवि ने 1917 में गांधी की बिहार यात्रा देखी। इसने ओडिशा के कॉलेजों को खुद से अलग होता हुआ देखा।

 

इसने आजादी की लड़ाई के न जाने कैसे कैसे किस्से सुने, पर शिक्षा का यह मंदिर कभी विचलित नहीं हुआ। इसे अपनी जवानी के वो दिन भी याद हैं जब कभी इसके प्रांगण में कोई विवाद होता और मजबूरी में पुलिस फोर्स को बुलाना होता तो पुलिस के अधिकारी और जवान गंगा किनारे बने रानीघाट हॉस्टल में घुसने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते थे। 

 

विश्वविद्यालय जानता था कि वो हिम्मत कर भी नहीं पाएंगे, क्योंकि इस हॉस्टल में रहने वाले छात्र कोई मामूली छात्र नहीं। वे या तो भावी आइएएस हैं या फिर आइपीएस। यह हॉस्टल साधारण छात्रों को नसीब भी नहीं होता पाता था। मेरिट लिस्ट में जो छात्र सबसे ऊपर रहते उन्हें ही यह हॉस्टल एलॉट होता।  

 

विश्वविद्यालय को अपने वो शिक्षक भी याद हैं जिन्होंने इसे सात पुराने विश्वविद्यालयों में पहल पायदान पर पहुंचाया। कुछ नाम तो जेहन में आज भी ताजा हैं।

 

इतिहासकार रामशरण शर्मा, सैयद अंसारी, राजनीति शास्त्र के शिक्षक वीपी शर्मा, संस्कृत के प्रकांड विद्वान रामावतार शर्मा, हिन्दी के नामचीन हस्ताक्षर नलिन विलोचन शर्मा, भूगोल के शिक्षक पी. दयाल, रसायन शास्त्र के जेएन चौधरी, भौतिकी के शिक्षक एमएन सिन्हा, कमला प्रसाद और अर्थशास्त्र के विद्वारन प्रोफेसर गोरख प्रसाद। 

 

विश्वविद्यालय को याद है कि जेपी की संपूर्ण क्रांति। क्योंकि इस क्रांति में भाग लेने वाले अधिकांश नौजवान-छात्र उसके प्रांगण से ही निकले थे। उन दिनों इस विवि अधीन चलने वाले तमाम कॉलेजों में सभाएं और बैठकें आम हो गई थी।पटना कॉलेज का मैदान हो या फिर बीएन कॉलेज का कॉमन रूम छात्र नेता यहां बैठ आंदोलन की चर्चाएं करते, रणनीति बनाते।

 

प्रो बलराम तिवारी बताते हैं कि सत्तर के दशक में बिहार में कर्पूरी ठाकुर का शासन था। सरकार का फैसला हुआ, छात्रों के लिए अंग्रेजी विषय अनिवार्य नहीं होगा। वे हिन्दी भाषा में पढ़ भी सकेंगे और परीक्षाएं भी दे सकेंगे। विश्वविद्यालय देख रहा था कि चीजें बदल रही हैं। लेकिन उसे पता है बदलाव ही नियति है।

 

समय जैसे-जैसे बीतेगा चीजें और भी बदलेंगी। पर भली-बुरी स्मृतियों को कोई भी बदलाव धुंधला नहीं सकेगा। चीजें याद रहेंगी विश्वविद्यालय के रहने तक। 

Posted By: Kajal Kumari

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