पटना। कला अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सरल और सशक्त माध्यम है। कला का जुड़ाव जीवन और समाज से होता है। समाज के प्रति कलाकारों का भी अपना दायित्व होता है। ये बातें डेढ़गांव (रोहतास) के स्वतंत्र चित्रकार और लेखक भुनेश्वर भास्कर ने प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक की ओर से आयोजित फेसबुक लाइव 'आखर' कार्यक्रम के दौरान कहीं। उनसे बातचीत पी राज सिंह ने की।

'आखर बिहार' फेसबुक लाइव कार्यक्रम के तहत भोजपुर की लोक कला, संस्कृति, परंपरा पर चित्रकार व लेखक ने अपनी बातें बेबाकी से रखीं। भास्कर ने बताया कि कला के प्रति रूझान बचपन से ही रहा। 13 साल की उम्र में ही 'सस्ता खून, महंगा पानी' नाटक में प्रस्तुति देने का मौका मिला। रंगमंच और पेंटिंग में कदम आगे बढ़ने लगे। उन्होंने बताया कि गांव के रीति-रिवाज, परंपरा को चित्रों में उकेरा और फिर शब्दों के जरिए इसकी महत्ता को बताने का प्रयास किया। भोजपुर में महिलाएं चित्रों को बनाने के साथ गीत भी गाया करती हैं। इन गीतों का भी अपना महत्व रहा है। भोजपुरी चित्रकला को मैथिली चित्रकला की तरह कोई नायक और नायिका नहीं मिली। भोजपुरी कला में सौ फीसद महिलाओं की भागीदारी रही है। किसी भी लोक कला में पेंटिंग की बारीकियों को समझने की जरूरत है नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। वर्ष 2007 में प्रकाशन विभाग की ओर से उनकी पुस्तक 'भोजपुरी लोक संस्कृति और परंपराएं' प्रकाशित हुई, जिसे पाठकों ने खूब सराहा। कार्यक्रम के दौरान कई लोगों ने लेखक से कई सवाल-जवाब किए। धन्यवाद ज्ञापन मसि इंक की संस्थापक और निदेशक आराधना प्रधान ने किया। कार्यक्रम में सत्यम कुमार, ब्रज भूषण मिश्रा, सुमन कुमार सिंह अपने विचार दिए।

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