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पटना के कदमकुआं में फिर घूमेगा चरखा, लौटेगी प्रभावती देवी की विरासत; महिलाओं को मिलेगा रोजगार

Published: Sun, 11 Oct 2026 09:47 AM (GMT+05:30)

पटना के कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति में दशकों बाद फिर से चरखा प्रशिक्षण शुरू होने जा रहा है, जो महिलाओं को आत्मनिर्भरता और रोजगार के अवसर प्रदान करेगा।

कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति का भवन।जागरण

कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति का भवन।जागरण

HighLights

  1. दशकों बाद महिला चरखा समिति में प्रशिक्षण फिर शुरू।

  2. प्रभावती देवी की विरासत, गांधीजी के स्वावलंबन विचार जीवंत।

  3. महिलाओं को आत्मनिर्भरता, कुटीर उद्योग से जोड़कर सशक्त करना।

जागरण संवादददाता, पटना। एक दौर था, जब कदमकुआं की महिला चरखा समिति में गूंजती चरखे की घर्र-घर्र सिर्फ सूत नहीं कातती थी, बल्कि महिलाओं के सपनों को आत्मनिर्भरता के धागों से बुनती थी।

गांधी के स्वदेशी आंदोलन से निकली यह आवाज महिलाओं को घर की दहलीज लांघने का हौसला देती थी और आजादी की लड़ाई में उनकी भागीदारी का रास्ता खोलती थी।

वक्त के साथ कुछ समय के लिए यहां चरखा चलना बंद हो गया था वहीं फिर से यहां पर चरखे के स्वर सुनाई देगा। कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति के सचिव मृदुला सिन्हा ने बताया कि यहां पर फिर से चरखे के प्रशिक्षण को लेकर भारत सरकार के खादी बोर्ड से निबंधित करने को लेकर पत्र भेजा गया है।

यहां पर प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली महिलाएं प्रभावती देवी की स्मृतियों को जीवंत करेगी। महिलाओं को चरखा चलाने का व्यापक प्रशिक्षण दिया जाएगा और उनके हाथों से तैयार सूत व कपड़े को बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था होगी।

इसके लिए बिहार खादी माल से बातचीत भी हो चुकी है। यह पहल प्रभावती देवी की विरासत को सहेजने के साथ गांधी के स्वावलंबन के विचार को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश है।

प्रभावती देवी ने रखी थी नींव

महिला चरखा समिति की अनुसार लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी ने महात्मा गांधी के आशीर्वाद और डा. राजेंद्र प्रसाद के मार्गदर्शन में 26 जून 1940 को 'बिहार महिला चरखा क्लास' की स्थापना की थी। उस दौर में महिलाओं के लिए घर की दहलीज लांघना भी आसान नहीं था।

पर्दा प्रथा और सामाजिक बंदिशों के बीच चरखा उनके लिए हुनर सीखने, आत्मविश्वास बढ़ाने और स्वावलंबन की राह पर आगे बढ़ने का माध्यम बना। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में चरखा क्लास से जुड़ी महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई।

इस तरह समिति का महत्व सूत कातने और कपड़ा बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह महिलाओं की सामाजिक जागरूकता और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी का भी केंद्र बनी।

राजेंद्र बाबू से जेपी तक जुड़ा रहा नाता

समिति के संचालन मंडल में 1940 से 1946 तक डा. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष रहे। उनके दिल्ली जाने के बाद जयप्रकाश नारायण संस्था की जिम्मेदारी संभालने लगे।

आजादी के बाद 1948 में कदमकुआं में समिति के लिए जमीन खरीदी गई। वर्ष 1951 में देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने नए भवन का उद्घाटन किया।

1952 में सोसाइटी एक्ट, 1860 के तहत संस्था का पंजीकरण हुआ। समिति का परिसर गांधीवादी विचारों और सामाजिक बदलाव की गतिविधियों से जुड़ा रहा।

1974 में संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान भी यह महत्वपूर्ण केंद्र बना। प्रभावती देवी का 1973 में निधन हो गया। उनके जाने के कुछ वर्षों बाद यहां चरखा चलना बंद हो गया था।

अब समिति में चरखा दोबारा शुरू करने की योजना बनाई गई है। शुरुआत 11 नए चरखों से होगी और 25 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे चरखे की ऐतिहासिक विरासत को आजीविका से जोड़ने का प्रयास होगा।

वहीं , समिति के पुराने और जर्जर भवन को तोड़कर नया भवन बनकर तैयार हो गया है। इस भवन में महिला चरखा समिति से जुड़ी महिलाओं को घरेलू उत्पादों का प्रशिक्षण देने के साथ उनकी बनाई सामग्री की बिक्री होती है।

घर की दहलीज से बाहर लाने की पहल

आजादी के बाद भी महिलाओं के सामने कई सामाजिक बंदिशें थीं। पर्दा प्रथा के कारण घर से बाहर निकलना उनके लिए बड़ी चुनौती था। महात्मा गांधी के प्रयासों और डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा जयप्रकाश नारायण के सहयोग से चरखा समिति ने महिलाओं को आगे बढ़ने का अवसर दिया।

चरखा सीखने के बहाने वे घरों से निकलती थीं, समूह में काम करती थीं और अपने हुनर को पहचानती थीं। आज उसी विरासत को नए रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी है।

कभी चरखे ने महिलाओं को स्वावलंबन का रास्ता दिखाया था, अब उससे जुड़ी नई पहल रोजगार के अवसर पैदा करने की उम्मीद जगाती है।

कदमकुआं के इस ऐतिहासिक परिसर में चरखे की लौटती घर्र-घर्र अतीत की स्मृतियों के साथ महिलाओं के आत्मनिर्भर भविष्य का संदेश भी देगी।

चरखे से कुटीर उद्योग तक का सफर

समिति की परिकल्पना केवल सूत कातने तक सीमित नहीं थी। इसका व्यापक उद्देश्य महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर तैयार करना और उन्हें छोटे-छोटे घरेलू उद्योगों से जोड़ना था।

समय के साथ अचार, पापड़, सत्तू जैसे खाद्य उत्पादों के निर्माण और दूसरे हस्तकला आधारित कामों को भी कुटीर उद्योग की गतिविधियों से जोड़ा गया।

ऐसे कामों के जरिए महिलाएं अपने हुनर को आजीविका का माध्यम बना सकती थीं। इस पहल का महत्व उस समय और बढ़ जाता है, जब आजीविका के साधन सीमित थे और महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर काम करना आसान नहीं था।

समिति ने कौशल प्रशिक्षण को आर्थिक स्वावलंबन के साथ जोड़ने की दिशा में काम किया। गांधीजी के स्वदेशी विचार की मूल भावना भी यही थी कि स्थानीय संसाधनों और श्रम के आधार पर उत्पादन को बढ़ावा मिले तथा लोगों को अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े।

जेपी की स्मृतियों का भी है केंद्र

कदमकुआं स्थित महिला चरखा समिति का परिसर लोकनायक जयप्रकाश नारायण की स्मृतियों के कारण भी विशिष्ट है। प्रभावती देवी और जेपी के जीवन से जुड़ा यह स्थान बाद में प्रभा-जयप्रकाश स्मृति संग्रहालय के रूप में भी पहचान बनाने लगा।

परिसर में जेपी का शयनकक्ष, सभा कक्ष और प्रभावती स्मृति कक्ष उनकी निजी जिंदगी, विचारों और सार्वजनिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं। यही वह जगह है, जहां जेपी के जीवन के निजी प्रसंगों और उनके राजनीतिक संघर्ष के बीच का संबंध महसूस किया जा सकता है।

1974 के छात्र आंदोलन के दौरान कदमकुआं स्थित उनका निवास आंदोलन से जुड़े विचार-विमर्श और गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना। इसी आवास में 8 अक्टूबर 1979 को जेपी का निधन हुआ। समय के साथ संस्था की जरूरतें भी बदली हैं।

महिलाओं की बढ़ती प्रशिक्षण आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यहां महिला कुटीर उद्योग प्रशिक्षण-सह-रोजगार केंद्र और आंगनबाड़ी प्रशिक्षण केंद्र जैसी इकाइयों को विकसित करने की पहल की गई।

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