पटना, जागरण टीम। पटना के जिलाधीश की कोठी के पास से गुजरते हुए पीर अली बरबस याद हो आते हैं। इसी के समीप 7 जुलाई 1857 की शाम को उन्हें ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह और ओपियम एजेंट डॉ लॉयल की हत्या के आरोप में फांसी पर लटका दिया गया था। तत्कालीन पटना कमिश्नर विलियम टेलर का आवास इस जगह से चंद एकदम के फासले पर पर ही था, जो इन दिनों मुख्य न्यायाधीश का आवास है। 

कैथोलिक चर्च के पादरी पर भीड़ ने किया था हमला 

3 जुलाई 1857 की रात विलियम टेलर अपने आवास पर जब भोजन की तैयारी में जुटे थे उसी वक्त मजिस्ट्रेट ने आकर सूचना दी कि सैकड़ों बागियों के झुंड ने कैथोलिक चर्च के पादरी के घर पर हमला कर दिया है। टेलर ने तुरंत ही कैप्टेन रैट्रे को 150 सिख सिपाहियों के साथ बागियों से निबटने के लिए रवाना कर दिया। स्वयं टेलर घोड़े पर पर सवार होकर आसपास रहने वाले यूरोपियनों को सावधान करने निकल पड़ा। उसने जगह-जगह पर बागियों से निबटने के लिए सिख सिपाहियों को तैनात कर दिया। 

बागियों की तादाद देख भागी ब्र‍िटिश पुलिस 

पूरी तैयारी कर लेने के बाद टेलर अपने आवास के बाहर ही खड़ा होकर हरकारे की प्रतीक्षा करने लगा जो उसे घटनास्थल की ख़बरों से अवगत करवाता। तभी हाथ में नंगी तलवार लिए हुए हरकारे ने आकर टेलर को बताया कि बागियों ने डॉ लॉयल की हत्या कर दी है। उसने यह भी बताया कि बागियों की संख्या ज्यादा थी, इसलिए हमारे सिपाहियों को वहां से भागना पड़ा। 

दानापुर फौजी छावनी से मांगी मदद 

तब टेलर ने अपने एक नौकर को सबसे तेज भागने वाले घोड़े पर दानापुर फौजी छावनी के जनरल के पास रवाना कर दिया, ताकि वो वहां से 50 यूरोपियन सिपाहियों को भेज सके। तब तक टेलर को सूचना मिली कि बागी वहां से भाग गए हैं। तब तक सुबह के चार बज गए थे। 

एक बागी ने बता दिए साथियों के नाम

इस रात की मुठभेड़ में जख्मी एक बागी विलियम टेलर के हाथों में पड़ गया। 4 तारीख की सुबह टेलर उसे अपने घर पर ले आया। वह बुरी तरह जख्मी था। पहले तो उसने कुछ भी नहीं बताया। टेलर ने उसे सिख हॉस्पिटल में डॉ सदरलैंड और डॉ कॉट्स के पास भेज दिया। वहां दोनों डॉक्टरों ने बहुत सावधानी के साथ उसका इलाज किया।उसे अब उम्मीद होने लगी थी कि वह अब बच जायेगा और उसे फांसी की सजा नहीं होगी तो उसने पीर अली सहित सारे बागियों की जानकारी टेलर को दे दी।

33 सहयोग‍ियों के साथ गिरफ्तार हुए पीर अली 

उसी दिन डिप्टी मजिस्ट्रेट मौलाबक्श ने पीर अली के घर और उनकी दुकान की तलाशी ली। वहां उसे कुछ घातक हथियार और चिट्ठियों का पुलिंदा मिला जो उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे। पीर अली को उसके 33 सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 21 लोगों को उसी दिन पेड़ के सहारे फांसी पर लटका दिया गया। पीर अली जख्मी थे। टेलर ने उस दिन उन्‍हें फांसी नहीं दी। वह पीर अली से कुछ जानकारी हासिल करना चाहता था।    

फांसी की सजा सुनकर भी नहीं झुके 

फांसी की सजा सुनाने के बाद टेलर ने उसे अपने निजी कमरे में बुलाया और उनसे कुछ पूछताछ करना चाहा। टेलर ने अपनी रिपोर्ट 'आवर क्राइसिस' में लिखा है, 'मैंने पीर अली से पूछा कि क्या वह कुछ ऐसा करना चाहेगा कि उसे हम फांसी की सजा से बरी कर दें ? तो उन्‍होंने बेहद शांति और थोड़े हिकारत के साथ कहा: कुछ मामलों में जीवन बचाना अच्छा होता है, लेकिन कुछ मामलों में इसे खो देना ही अच्छा होता है।' फिर उन्‍होंने मेरे द्वारा किये गए जुल्म की भर्त्सना की और कहा, ' बेशक आप मुझे फांसी पर चढ़ा दें, मेरी तरह के और लोगों को भी फांसी पर चढ़ा दें, लेकिन हजारों लोग मेरी जगह पर उठ खड़े होंगे, आप अपने उद्देश्य में कभी सफल नहीं हो पाएंगे।'

आखिरी वक्‍त में थी परिवार की चिंता 

इस चुनौती के बाद पीर अली ने हथकड़ी लगे अपने हाथों को जोड़कर बड़ी विनम्रता के साथ कहा, 'मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं'- ' ठीक है, क्या पूछना चाहते हो ? बताओ, -'मेरा घर?- 'उसे ढहा दिया जायेगा'- 'मेरी संपत्ति?'- 'उसे सरकार जब्त कर लेगी' - 'मेरे बच्चे?' और पहली बार वह कमजोर दिखा। वह हकलाया। मेर पूछने पर कि उसके बच्चे कहां हैं - तो उसने बताया कि वे अवध में हैं।

सात जुलाई को दे दी गई फांसी 

मैं उसे इतना ही बता सका कि अभी देश की जो परिस्थितियां हैं उसमें कुछ भी अनुमान लगाना या वायदा करना मुमकिन नहीं है। तब पीर अली उठा, उसने सलाम किया और ख़ामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल गया। 

इसके तीन दिनों के बाद 7  जुलाई को पीर अली को फांसी दे दी गयी।

बिहार को बनाया कर्मभूमि

यूं तो पीर अली उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंने बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाया। प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शासन को हिलाने में अपनी भूमिका निभाई। विरोध के दौरान उन्होंने अंग्रेजों का सामना किया। वह उनके दबाव में नहीं आए बल्कि हंसते हुए फांसी पर चढ़ गए।

जन मानस को आंदोलन से जोड़ा

क्रांतिकारी पीर अली ने अंग्रेजी की गुलामी से देश को आजाद कराने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। देश की आजादी को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। दिल्ली के क्रांतिकारी अजीमुल्ला खान से वह मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। 1857 की क्रांति के समय उन्होंने पूरे बिहार में घूम-घूम कर लोगों में आजादी के संघर्ष का जज्बा पैदा किया। जन मानस को इक्ट्ठा करने में पीर अली ने अहम भूमिका अदा की।

सैकड़ों साथियों के साथ धावा बोला

पीर अली के नेतृत्व में 3 जुलाई 1857 को 200 से ज्यादा आजादी के दीवाने इकट्ठे हुए। उन्होंने अपने सैकड़ों हथियारबंद साथियों के साथ पटना के गुलजार बाग स्थित अंग्रेजों के प्रशासनिक भवन पर धावा बोल दिया। गुलजारबाग के उस भवन से क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी।

अंग्रेज अधिकारी को मार गिराया

क्रांतिकारियों के चौतरफा हमले से घिरे अंग्रेज अधिकारी डॉ. लायल ने क्रांतिकारियों पर फायरिंग शुरू कर दी। क्रांतिकारियों की जवाबी फायरिंग में डॉक्टर लायल अपने कई साथियों समेत मारा गया। अंग्रेजी हुकूमत की अंधाधुंध गोलीबारी में कई क्रांतिकारी भी बलिदान हुए, लेकिन पीर अली और उनके ज्यादातर साथी हमले के बाद बच निकलने में कामयाब हुए।

बगावत के जुर्म में हुई गिरफ्तारी

दो दिनों के बाद 5 जुलाई 1857 को पीर अली और उनके दर्जनों साथियों को पुलिस ने बगावत के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उन्हें यातनाएं दी गई। पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने उनसे कहा कि अगर आप अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम बता देंगे तो आपकी सजा टल जाएगी। लेकिन, पीर अली ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

आज क्रांतिकारियों को सम्मान भी नसीब नहीं

7 जुलाई 1857 को अंग्रेजों ने पीर अली और उनके कई साथियों को कलेक्टर आवास के पास बीच सड़क पर फांसी दे दी। साहित्यकार अरुण कुमार सिंह ने कहा कि यहां क्रांतिकारियों को सम्मान देना भी सरकारें मुनासिब नहीं समझती हैं। सरकारें बस औपचारिकता तक ही सिमट गई हैं।

पीर अली खां के बारे में जो सबसे चौंकाने वाली बात पता चली वो ये कि अंग्रेजी हुकूमत उनसे इतना खौफ खाती थी कि उन्हें गिरफ्तार करने के दो दिन के अंदर बिना कोई मुकदमा चलाए उन्हें सरेआम फांसी दे दी गई। पीर अली खां का जन्म 1820 में आजमगढ़ के एक गांव मोहम्मदपुर में हुआ था। किशोरावस्था में वो घर से भागकर पटना आ गए थे। पटना के जमींदार नवाब मीर अब्दुल्ला ने उनकी परवरिश की और पढ़ाया-लिखाया। बड़े होने पर नवाब साहब की मदद से उन्होंने किताबों की एक दुकान खोल ली। आगे चलकर वही दुकान बिहार के क्रांतिकारियों के जमावड़े का अहम ठिकाना बन गई। क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आने के बाद पीर अली खां दुकान पर क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर रखने लगे।

पीर अली ने अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ाद कराने की मुहिम में अपने हिस्से का योगदान देना अपने जीवन का मकसद बना लिया। उनका मानना था कि गुलामी की जिंदगी से मौत बेहतर होती। समय के साथ उनका दिल्ली और अन्य स्थानों के क्रांतिकारियों के साथ संपर्क में आए। दिल्ली के प्रमुख क्रांतिकारियों में एक अजीमुल्लाह खान उनके आदर्श थे, जिनके सुझाव और दिशा निर्देश पर वो चलने लगे।

पटना गांधी संग्रहालय के अध्यक्ष रजी अहमद के मुताबिक 1857 की क्रांति के वक्त पीर अली खां घूम-घूमकर लोगों में आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए जागरूक करने लगे। 3 जुलाई 1857... ये वो तारीख है जब पीर अली ने आजादी के आंदोलन को धार देते हुए अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दी, और उसकी गूंज इंग्लैंड तक महसूस की गई।

तब पीर अली की अगुवाई में कई टुकड़ियों में बंटकर इन हथियारबंद युवाओं ने पटना के गुलजार बाग में अंग्रेजों के एक प्रशासनिक भवन को चारों तरफ से घेर लिया। यह वही भवन था जहां से प्रदेश के लोगों की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी और उनपर कार्रवाई की रूपरेखा तैयार होती थी।

वहां तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलवाईं। कई क्रांतिकारी मौके पर ही शहीद हो गए, लेकिन पीर अली खां और कुछ क्रांतिकारी वहां से बच निकलने में कामयाब हो गए। लेकिन 5 जुलाई 1857 को पीर अली को 14 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। पीर अली पर बगावत का आरोप लगाकर उन्हें यातनाएं दी गईं।

7 जुलाई 1857 को पीर अली को उनके कई साथियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया। अंग्रेज अधिकारी पीर अली से उनके सभी साथियों के नाम जानना चाहते थे, लेकिन पीर अली ने देश से गद्दारी करने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा।

(पटना के इतिहास अध्‍येता अरुण सिंह से बातचीत पर आधारित आलेख)

Edited By: Shubh Narayan Pathak