खगौल। सरकारी व्यवस्था की बेरुखी से एक महिला रेलकर्मी का शव अस्पताल के शव गृह में करीब 14 घंटे तक पड़ा रहा। परिजन रातभर शव लेने के लिए अस्पताल प्रशासन से गुहार लगाते रहे, मगर व्यवस्था का हवाला देकर इन्कार किया जाता रहा। जब परिजनों के सब्र का बांध टूट गया और लोग हंगामा करने तो आनन-फानन में शव को परिजनों के सुपुर्द किया गया। मामला खगौल स्थित दानापुर रेल मंडल अस्पताल का है।

पीड़ित रेलवे गार्ड से सेवानिवृत्त विजय कुमार तिवारी ने बताया कि उनकी पत्नी मंजू कुमारी दुबे रेलवे में दानापुर स्टेशन पर ओएस पद पर कार्यरत थीं। चार दिन पहले उन्होंने कोरोना वैक्सीन की पहली डोज ली थी। मगर उनकी तबियत खराब होने से उन्हें रेलवे अस्पताल में इलाज के लिए ले जाया गया। जहां कोरोना की जांच में रिपोर्ट निगेटिव आई। मंगलवार की शाम उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई और उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल प्रशासन द्वारा उनके शव को शवगृह में डाल दिया गया। उन्होंने बताया कि अस्पताल प्रशासन ने स्थानीय पुलिस का मामला बता शव देने से मना किया। उन्होंने जब स्थानीय खगौल थाने से संपर्क किया तो थाने द्वारा अस्पताल व जिला प्रशासन का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया गया। एक स्थानीय साथी की मदद से दानापुर के डीसीएलआर से संपर्क कर शव सौंपने की बात कही गई तो डीसीएलआर ने उन्हें सरकारी नियम समझाए। मगर अस्पताल प्रशासन पुलिस के सामने और पंचनामा भरकर ही शव देने पर अड़ा रहा। इस बीच गया के अतरी निवासी सेवानिवृत्त रेलकर्मी राम विनय का शव भी मंगलवार रात से शव गृह में पड़ा रहा। उनके पुत्र मुकेश सिंह भी शव लेने की गुहार लगाते रहे। अस्पताल प्रशासन के रवैये से दोनों मृतकों के परिजनों का सब्र का बांध टूटा और वे हंगामा करने लगे। हंगामा बढ़ता देख अस्पताल प्रशासन ने कागजी कार्यवाही पूरी करा परिजनों को शव सौंपा।

छह दिन से इलाज के लिए भटका, ऑक्सीजन के अभाव में मौत

बिहटा। मुख्यमंत्री के निर्देश के बावजूद पटना जिले में इलाज की व्यवस्था सुधरने का नाम नहीं ले रही है। ऐसा हम नहीं, बल्कि कोरोना महामारी से हो रही मौतों में अपने परिजनों को खोने वाले लोग कह रहे हैं। ताजा मामला बिहटा के बेला गांव निवासी 38 वर्षीय जीतन महतो से जुड़ा है। उनका आरोप है कि पिछले कई दिन से जीतन की तबियत खराब थी। उसे सर्दी-खांसी के साथ बुखार भी था। स्थानीय स्तर पर जब बात नहीं बनी तो उसके परिवार ने पटना का रुख किया। जहां जांच में कोरोना की पुष्टि हो गई, लेकिन इलाज के लिए कहीं उसे बेड नहीं मिला। नतीजतन, गरीब पत्नी उसे दवा खरीदकर घर ले आई। दवा खाने के बाद भी उसका मर्ज बढ़ता गया। जब उसके शरीर में ऑक्सीजन लेवल कम हुआ और हांफने की शिकायत हुई तो उसे लेकर वे लोग ईएसआइसी अस्पताल पहुंचे। उन्हें लग रहा था उनके प्रखंड में खुला ये कोविड केयर अस्पताल उनकी समस्या का निदान कर देगा। लेकिन वहां पहुंचने पर पता चला कि बेड खाली नहीं ये कहकर डॉक्टर ने उसे लौटा दिया। बुधवार को सुबह आखिरकार ऑक्सीजन व बेहतर इलाज की आस में उसकी सांस की डोर टूट गई। जीतन के दो छोटे बच्चे व उसकी पत्नी खेती-किसानी के कार्य से जुड़ी आमदनी पर ही जीवित थी।

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