बिहार में जल, जंगल और जमीन को साथ लेकर चलने की जरूरत, पर्यावरणविद डॉ. जोशी ने बताया विकास का रास्ता
पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने प्रकृति पथ यात्रा के दौरान बिहार के अनुभवों को साझा किया, जिसमें बाढ़ की ...और पढ़ें

प्रकृति पथ यात्रा के अनुभव साझा करते पर्यावरणविद डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी। जागरण
HighLights
बाढ़ को रोजगार के अवसर में बदलने पर जोर दिया।
छठ महापर्व बिहार की प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक।
सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) का महत्व समझाया।
जागरण संवाददाता, पटना। पर्यावरण संरक्षण, हिमालय और जल संरक्षण के उद्देश्य से दो अक्टूबर को नेपाल के जनकपुर से शुरू हुई प्रकृति पथ यात्रा बिहार से गुजर रही है।
पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी 16 सदस्यीय दल के साथ इस यात्रा पर निकले हैं।
यात्रा का उद्देश्य घर, गांव, राज्य और देश में प्रकृति की स्थिति को समझना, पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनाओं को जानना और संरक्षण के प्रयासों की समीक्षा करना है।
इसके तहत महिलाओं, बच्चों, शिक्षकों, नीतिकारों और राजनीतिक नेतृत्व से संवाद किया जा रहा है। 22 अक्टूबर को यात्रा उत्तर प्रदेश के बलिया में प्रवेश करेगी। वहां राज्य की पारिस्थितिकी और आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाएगा।
बिहार में बाढ़, जल संरक्षण, छठ महापर्व, स्वच्छता, ग्रामीण विकास और रोजगार की संभावनाओं पर डॉ. जोशी से बातचीत के प्रमुख अंश...
प्रश्न: प्रकृति पथ यात्रा के दौरान बिहार का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: बिहार में प्रकृति और पर्यावरण के लिहाज से अनुभव सुखद रहे। एक ओर राज्य बाढ़ की समस्या झेलता है। नेपाल में भारी वर्षा के कारण गंडक और कोसी जैसी नदियों में पानी बढ़ने का असर बिहार पर पड़ता है। इसके बावजूद यहां प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता दिखाई देती है। नीति-निर्माताओं और नेतृत्व की भूमिका के साथ घर-गांव में लोगों का प्रकृति से जुड़ाव भी महत्वपूर्ण है। यहां की संस्कृति और संस्कार में प्रकृति के प्रति सम्मान झलकता है।
प्रश्न: बिहार की कौन-सी विशेषता सबसे अधिक प्रभावित करती है?
उत्तर: छठ महापर्व बिहार की प्रकृति से जुड़ी संस्कृति का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह जुड़ाव केवल नदी या घाट तक सीमित नहीं है, जहां लोग पूजा करने जाते हैं। घरों और गांवों में भी प्रकृति के प्रति आस्था दिखाई देती है। छठ के माध्यम से लोग प्रकृति के प्रति अपना स्नेह और सम्मान प्रकट करते हैं। यह सांस्कृतिक ताकत पर्यावरण संरक्षण के लिए लोगों को प्रेरित कर सकती है।
प्रश्न: वर्ष 2013 की यात्रा के मुकाबले आज बिहार में क्या बदलाव दिखते हैं?
उत्तर: मैंने अपने कुछ साथियों के साथ 2013 में भी बिहार की यात्रा की थी। तब से अब तक राज्य में काफी बदलाव महसूस किया है। शासन-प्रशासन से लेकर सड़क और संपर्क व्यवस्था तक में सुधार दिखाई दिया है। हाईवे ने शहरों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं गांवों की सड़कें भी लोगों को करीब लाई हैं। सिंचाई का दायरा बढ़ा है और लोग बदलते पर्यावरण के बीच बेहतर जीवन के लिए प्रयास कर रहे हैं। बिहार को लेकर बनी धारणाओं में भी बदलाव की जरूरत है। इसके लिए जमीनी स्थिति को समझना जरूरी है।
प्रश्न: छोटे शहरों और कस्बों में क्या खास देखने को मिला?
उत्तर: बांका का उदाहरण मेरे लिए खास रहा। वहां लोगों ने अपने शहर को साफ-सुथरा रखने की कोशिश की है। छोटी चाय की दुकानों और ढाबों पर भी स्वच्छता के प्रति जागरूकता दिखाई दी। कुछ दुकानदारों ने सड़क पर कचरा फेंकने के बजाय दुकान के पास ही कंटेनर रखे थे। देश में इंदौर जैसे शहरों की स्वच्छता की चर्चा होती है, लेकिन बांका जैसे छोटे शहरों के प्रयासों को भी पहचान मिलनी चाहिए। स्थानीय भागीदारी से स्वच्छता की संस्कृति विकसित हो सकती है और दूसरे हिस्से भी इससे सीख सकते हैं।
प्रश्न: बिहार में बाढ़ की समस्या से निपटने का क्या रास्ता हो सकता है?
उत्तर: बिहार में बाढ़ बड़ी समस्या है, लेकिन इससे प्रभावित लोगों का धैर्य और उत्साह उल्लेखनीय है। वे बार-बार कठिनाइयों से उबरकर जीवन को पटरी पर लाने में जुट जाते हैं। बाढ़ को केवल आपदा के रूप में देखने के बजाय पानी के बेहतर उपयोग की संभावनाओं पर भी विचार करना चाहिए। जहां पानी कई महीनों तक ठहरता है, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मखाना की खेती, मत्स्य पालन और झींगा पालन जैसे रोजगार विकसित किए जा सकते हैं। मिथिलांचल में तालाबों और जलाशयों का उपयोग खेती तथा मत्स्य पालन में होते देखना अच्छा लगा। जरूरत है कि पानी को स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ा जाए।
प्रश्न: पर्यावरण संरक्षण और रोजगार को एक साथ कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर: बिहार प्रकृति संरक्षण और रोजगार सृजन का माडल राज्य बन सकता है। इसके लिए स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों को समझकर उनका टिकाऊ उपयोग करना होगा। स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार से अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और प्रकृति का संरक्षण भी संभव होगा। खेती, जल, वन और जैव विविधता को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ जोड़ना होगा। इससे लोगों की आजीविका बेहतर होगी और पर्यावरण पर दबाव भी कम किया जा सकेगा।
प्रश्न: सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) क्यों जरूरी है?
उत्तर: सकल पर्यावरण उत्पाद यानी ग्रास एनवायरनमेंट प्रोडक्ट (जीईपी) के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के योगदान का आकलन किया जा सकता है। मेरा मानना है कि बिहार का जीईपी अच्छा हो सकता है और इसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विकास का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि विकास के दौरान जल, जंगल, जमीन और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति कैसी है। इससे योजनाएं बनाने और उनके परिणामों को समझने में मदद मिलेगी।
प्रश्न: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात में किन मुद्दों पर चर्चा हुई?
उत्तर: मुख्यमंत्री से बातचीत में नदियों, सड़कों और छोटे बांधों से जुड़ी योजनाओं का जिक्र हुआ। उन्होंने गांवों के विकास की योजनाओं और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को भी साझा किया। यह देखकर अच्छा लगा कि उन्होंने छठ पूजा और प्रकृति से बिहार के जुड़ाव पर गर्व व्यक्त किया। मैंने उनसे बिहार डेवलपमेंट डायलाग्स सीरीज शुरू करने का आग्रह किया। इसमें कृषि, वन, नदियों और जल संरक्षण जैसे विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। राज्य में मौजूद केंद्रीय संस्थानों और विशेषज्ञों को भी इससे जोड़ना चाहिए। विशेषज्ञों के सुझाव नीति-निर्माताओं और योजनाकारों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। मुख्यमंत्री ने इस विषय पर संबंधित अधिकारियों के साथ बैठक कर आगे बढ़ने की बात कही।
प्रश्न: यात्रा में महिलाओं और स्थानीय समुदायों की क्या भूमिका सामने आई?
उत्तर: बिहार में सामुदायिक संगठनों की ताकत दिखाई दी। खासकर महिलाओं की भागीदारी और जागरूकता ने प्रभावित किया। बछवाड़ा में बड़ी संख्या में महिलाओं ने हमारा स्वागत किया और अपने कामों के बारे में बताया। महिलाएं केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि अपने समुदाय और विकास से जुड़े फैसलों में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यह सामाजिक बदलाव की महत्वपूर्ण निशानी है। प्रकृति संरक्षण के प्रयासों को सफल बनाने में महिलाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है।
प्रश्न: बिहार के भविष्य को लेकर आपकी क्या उम्मीदें हैं?
उत्तर: बिहार में प्रकृति, अर्थव्यवस्था और समाज को साथ लेकर चलने की बड़ी संभावनाएं हैं। यहां की संस्कृति, स्थानीय संसाधन, सामुदायिक भागीदारी और लोगों की मेहनत इसकी ताकत हैं। जरूरत है कि इन ताकतों को विकास योजनाओं से जोड़ा जाए। खेती, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा। जब लोगों की भावनाओं का सम्मान होगा और उनकी आजीविका मजबूत होगी, तभी समग्र विकास संभव है। मुझे विश्वास है कि बिहार आने वाले समय में प्रकृति आधारित विकास की दिशा में देश के सामने एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
