पटना [अरविंद शर्मा]। उपचुनाव के नतीजे का आकलन आम-चुनाव के संदर्भ में करना अक्सर सटीक नहीं होता है। पिछले दो दशकों से बिहार में तो यह पूरी तरह गलत साबित होता रहा है। हालांकि इससे विभिन्न दलों अथवा गठबंधनों की मजबूती और जातीय गठजोड़ों के जरिए सियासी रुझान के संकेत जरूर मिल जाते हैं, जिसके आधार पर आगे की तैयारियों का रास्ता खुलता है। 

बिहार में लोकसभा की एक और विधानसभा की पांच सीटों के उपचुनाव के भाग्यशाली उम्मीदवारों का पता 24 अक्टूबर को चल जाएगा। पिछले दो दशकों के आंकड़े बताते हैं कि आम चुनावों की तुलना में उपचुनाव के नतीजे अक्सर उलट जाते हैं। जिस किसी दल या गठबंधन को आमचुनाव में कामयाबी मिलती है, उपचुनाव में वह नाकाम हो जाता है।

ऐसे में यह अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन गठबंधन किस पर भारी पडऩे जा रहा है। दिसंबर 2005 में राजग के पहली बार बिहार की सत्ता में आने के बाद से हुए उपचुनावों के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाएं तो स्पष्ट हो जाएगा कि किसी की सफलता में निरंतरता नहीं रही है। आम चुनाव में जिस दल या गठबंधन ने बढ़त ले ली, अगले चुनाव में वही धराशायी हो गया।

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के चार महीने के भीतर बिहार में विधानसभा की 18 सीटों पर उपचुनाव हुए थे। उस वक्त बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा-जदयू की सरकार थी। माना जा रहा था कि उपचुनाव में भी राजग का प्रदर्शन बेहतर होगा। किंतु नतीजा उलट गया। 18 सीटों में से 12 सीटें राजग विरोधी खेमे में चली गई।

राजग को सिर्फ छह सीटों से संतोष करना पड़ा। चार जदयू को और दो भाजपा को मिली। सबसे बेहतर नतीजा कांग्रेस के पक्ष में आया। बिना गठबंधन किए उसने अकेले अपने दम पर लड़कर दो सीटें जीत लीं। एक बसपा और एक निर्दलीय के खाते में भी गई। हैरत यह कि लोकसभा चुनाव में बुरी तरह मात खाने वाला राजद-लोजपा गठबंधन ने आठ सीटें जीत लीं। राजद को पांच और लोजपा के खाते में तीन सीटें आई थीं। 

उपचुनाव के नतीजे से अगले चुनाव का अनुमान लगाना आगे भी गलत साबित हुआ। उपचुनाव के महज साल भर बाद विधानसभा के आम चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राजग को फिर प्रचंड बहुमत मिला और राज्य में जदयू भाजपा की सरकार बनी। 

यह सिलसिला आगे भी चलता रहा। 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद दस सीटों पर उपचुनाव कराए गए। मोदी लहर के सहारे लोकसभा में भारी बहुमत से आए भाजपा को उपचुनाव के नतीजों ने निराश किया। भाजपा को दस में से महज चार सीटें मिलीं, जबकि महज तीन महीने पहले लोकसभा चुनाव में उन्हीं दस सीटों में से आठ पर भाजपा प्रत्याशी ने बढ़त बनाई थी। भाजपा से अलग होकर राजद से दोस्ती का पुरस्कार जदयू गठबंधन को मिला। उसे 10 में से छह सीटें मिल गईं। 

एडीआर के बिहार प्रमुख एवं राजनीतिक विश्लेषक राजीव कुमार के मुताबिक उपचुनाव के नतीजों के आधार पर सत्ता और सियासत में परिवर्तन की कल्पना पूरी तरह सत्य नहीं होती है। उपचुनाव के नतीजे सिर्फ आम चुनाव की तैयारी कर रही बड़ी पार्टियों को आगाह भर करते हैं कि सियासत में बने-जमे रहने के लिए उन्हें आगे और मेहनत करने की जरूरत है। 

Posted By: Kajal Kumari

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