पटना, आलोक मिश्र। बिहार की विशिष्ट पहचान यह भी है कि यहां हर बात में राजनीति हो जाती है। किसी एक परिघटना का कोई पक्ष सामने आता है। लेकिन बहुत कुछ पीछे छिप जाता है। इस छिपे हुए पक्ष को लेकर फिर राजनीति शुरू हो जाती है। यह सिलसिला उस समय तक चलता रहता है, जब तक कि कोई दूसरी घटना न हो जाए। कोई नया मुद्दा न मिल जाए। जातिगत जनगणना को लेकर इन दिनों यही हो रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इसके पक्ष में हैं। उन्होंने पहल की। नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल मिला। यह बड़ी राजनीतिक घटना थी। लेकिन एक समय के बाद यह विषय परिदृश्य में ओझल हो गया था। अब फिर से मुख्य पटल पर आ गया है तो राजनीति भी शुरू हो गई है।

ताजा राजनीतिक घटनाक्रम यह है कि विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव मंद पड़ रही जातिगत जनगणना की मांग को फिर आवाज दे बैठे। गत मंगलवार को उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री 72 घंटे के भीतर कोई सकारात्मक फैसला लें, अन्यथा वह पैदल ही दिल्ली चल देंगे। लेकिन नीतीश कुमार ने उन्हें 30 घंटे के भीतर ही बुला लिया। आम तौर पर ऐसी मुलाकातों में किसी तीसरे की उपस्थिति जरूर होती है। लेकिन तेजस्वी से मुलाकात के बारे में बताया गया कि उस समय कोई तीसरा नहीं था। यहां तक कि सरकारी अधिकारियों को भी इस मुलाकात से दूर रखा गया था। तीसरे की उपस्थिति न होने के बावजूद बैठक की खबर तेजस्वी के माध्यम से बाहर आई, जिसमें उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जातिगत जनगणना के लिए सहमत हैं। वैसे देखा जाए तो इस जानकारी में कुछ भी नया नहीं है। मुख्यमंत्री तो पहले से ही सहमत हैं, सवाल है जनगणना कराने का।

जातिगत जनगणना के मुद्दे पर गत बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद पत्रकारों से वार्ता करते नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव। जागरण

इस मुलाकात के बाद तेजस्वी की इस शांति ने नई राजनीति को जन्म दे दिया। प्रदेश स्तरीय सहमति और केंद्रीय असहमति के बीच झूल रहे साथी भारतीय जनता पार्टी पर जदयू ने फिर दबाव बना दिया। जदयू-राजद की संभावित जुगलबंदी को फिर हवा दे दी। तेजस्वी के हाथ यह बड़ा मुद्दा जाने से रोककर वही काम किया जो प्रधानमंत्री से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात के दौरान किया था यानी अगुआई।

जातिगत जनगणना ऐसा विषय है जिसमें सभी दलों के सुर एक हैं। तेजस्वी ने जब पदयात्र की घोषणा की तो विकासशील इंसान पार्टी के मुखिया मुकेश सहनी भी उनके साथ तुरंत तैयार हो गए। सरकार के सहयोगी पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने- गधों की गणना हो सकती है तो जातिगत क्यों नहीं, ऐसा कहकर माहौल गरमाने का काम किया। चूंकि बात मुख्यमंत्री से संबंधित थी तो जदयू ने भी जवाब देने में देर नहीं लगाई, तुरंत इसका समर्थन कर दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बुलाकर समझाया कि कैबिनेट से इसे पास कराकर जनगणना कराई जाएगी। जल्द ही सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी। तेजस्वी खुश होकर बाहर निकल आए। यह तय माना गया कि अब जातीय जनगणना होनी ही है। हालांकि भाजपा फिलहाल चुप है, क्योंकि केंद्र इस पर राजी नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री से मिलने गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में वह भी शामिल थी। इसलिए उसकी चुप्पी मौन सहमति ही मानी जा रही है।

आखिर प्रारूप में कितनी जातियों का नाम शामिल किया जाएगा। उच्चारण बदलने से ही कई जातियां बदल जाती हैं। मोटे तौर पर करीब दो सौ जातियों का जिक्र हो पाता है। लेकिन जातियों के अंदर कई जातियां हैं। मल्लाह या निषाद को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। इसकी कई जातियां हैं जो काम के वर्ग के हिसाब से तो एक हैं, लेकिन उनके बीच शादी-ब्याह का संबंध नहीं बन पाता। यही हाल वैश्य बिरादरी का है। इनके अलावा सवाल साधन और संरचना का भी है। बिहार में भूमि सर्वेक्षण का प्रयास वर्ष 2011 से चल रहा है। बीते 11 वर्षो में किसी एक जिले का भूमि सर्वेक्षण कार्य पूरा नहीं हुआ है। जबकि इसके उपक्रम के लिए केंद्र सरकार भी धन दे रही है। सरकार लाख कोशिश कर ले, फिर भी दो-चार साल में जातिगत जनगणना का पूरा होना संभव नहीं दिखता है। हां, इसकी घोषणा हो सकती है। अधिसूचना जारी हो सकती है और यह अगले कुछ चुनावों तक मुद्दा बना रह सकता है।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal