यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 29, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
नीतीश कुमार को लगी चोट, लालू यादव और तेजस्वी को हो रहा दर्द; बिहार विधानसभा के उपचुनाव में ये क्या खेल
Bihar Politics भाजपा के लिए फायदे वाली बात यह है कि बिहार के CM नीतीश कुमार के पेट की चोट ...और पढ़ें

रांची, आलोक मिश्रा। इस समय देश की निगाहें अगर हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव पर लगी हैं तो बिहार में मोकामा और गोपालगंज विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव चर्चा का विषय हैं। ये उपचुनाव सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं चाहे वह दल दंगल में शामिल हो या नहीं। इस उपचुनाव में मुख्य प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल हैं और इनमें एक-एक सीट दोनों के पास थी। आंकड़े इसी स्थिति को दोहराने की तरफ झुके दिखाई देते हैं तो समीकरण कुछ भी हो सकता है की तरफ। यदि भाजपा के हाथ दोनों आती हैं तो नीतीश कुमार का झटका उसके लिए मायने नहीं रखेगा और यदि राजद को यह मौका मिलता है तो सदन में समीकरण उसके पक्ष में चले जाएंगे।
भाजपा के लिए फायदे वाली बात यह है कि नीतीश कुमार पेट की चोट के कारण दोनों ही जगह प्रचार में नहीं जा रहे। भले ही दलों की साख इसमें लगी हो, लेकिन देखा जाए तो मोकामा से अनंत सिंह व गोपालगंज से भाजपा के सुभाष सिंह वर्ष 2005 से ही जीतते आ रहे हैं। एके 47 हथियार रखने के आरोप में अनंत सिंह के जेल जाने और सदस्यता रद होने के कारण मोकामा सीट रिक्त हुई है, जबकि बीमारी से सुभाष सिंह का देहांत होने से गोपालगंज सीट। इन सीटों से दोनों की पत्नी चुनाव मैदान में हैं। राजद ने अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी और गोपालगंज से भाजपा ने सुभाष सिंह की पत्नी कुसुम देवी को मैदान में उतारा है।

गोपालगंज से समीकरण दिलचस्प
पुराने आंकड़े इतिहास दोहराने की गवाही देते हैं, लेकिन स्थिति ऐसी नहीं है। मोकामा में यादव-भूमिहार के आपसी विरोध के कारण भूमिहार वोट राजद से दूरी बनाते बताए जा रहे हैं। विरोध में भाजपा ने रालोजपा (पारस गुट) नेता पूर्व सांसद सूरजभान के भाई नलिनी रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह की पत्नी सोनम देवी को उतारा है। बाहुबल में सूरजभान अनंत सिंह से कम नहीं हैं। इसलिए इस टक्कर को कड़ी माना जा रहा है। हालांकि वर्ष 2015 में अनंत सिंह ने निर्दलीय लड़कर यहां से सीट जीती थी। इसलिए पलड़ा उनका कमजोर नहीं माना जा सकता। गोपालगंज से समीकरण दिलचस्प हैं।
वर्ष 2015 में जब नीतीश और लालू साथ थे तब भाजपा के सुभाष सिंह को वहां 78,417 वोट मिले थे और जब 2020 में नीतीश साथ थे तब लगभग हजार वोट कम हो गए थे। इसलिए 77-78 हजार भाजपा का बेस वोट माना जा रहा है। वर्ष 2015 में राजद ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था और लगभग तीन हजार से सीट खोई थी। वर्ष 2020 में महागठबंधन की तरफ से यह सीट कांग्रेस के कोटे में गई थी और 36 हजार वोट पाकर वह तीसरे स्थान पर रही थी। जबकि दूसरे स्थान पर बसपा के टिकट पर लड़े तेजस्वी के मामा साधु यादव को 41 हजार से अधिक वोट मिले थे।
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नीतीश की चोट ने राजद को खासा दर्द
माना जा रहा था कि यादवों के वोट राजद के साथ रहने के बाद भी कांग्रेस को न जाकर साधु यादव को गए, क्योंकि वर्ष 2015 में बसपा केवल साढ़े तीन हजार ही वोट पाई थी। इस बार साधु की पत्नी इंदिरा देवी बसपा के टिकट पर हैं। लेकिन इस बार तेजस्वी के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई है और यादव उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहा है, इसलिए यादव एकजुट हो सकते हैं और प्रत्याशी वैश्य होने के कारण कुछ लाभ मिल सकता है। इसलिए लड़ाई आसान नहीं कही जा सकती। इस चुनाव में खास बात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजद प्रत्याशियों के प्रचार में नहीं जा रहे, क्योंकि लगभग एक सप्ताह पूर्व गंगा घाटों का निरीक्षण करते समय स्टीमर टकराने से उनके पेट में चोट लग गई थी।
नीतीश का न जाना राजद को भारी पड़ सकता है, क्योंकि इससे यह संदेश जा रहा है कि नीतीश राजद की जीत नहीं चाहते। इसके पीछे लोग तर्क दे रहे हैं कि अगर राजद दोनों सीटें जीत गया तो राजद के 80, कांग्रेस के 19, वामदलों के 16 मिलाकर 115 हो जाएंगे। जीतनराम मांझी के चार, एआइएमआइएम के एक व एक निर्दलीय के सहारे 122 का साधारण बहुमत उसे हासिल हो जाएगा। वैसे भी 243 की विधानसभा में कुढ़नी की सीट अभी रिक्त है। बहुमत प्राप्त होने के बाद राजद को नीतीश कुमार की जरूरत नहीं रह जाएगी। इसलिए नीतीश जाने से कतरा रहे हैं। नीतीश की इस चोट ने राजद को खासा दर्द दे दिया है। हालांकि राजद और जदयू दोनों ही इस पर टिप्पणी करने से बच रहे हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसे नीतीश कुमार के चरित्र से जोड़ रही है। इस गुत्थम-गुत्था समीकरण के चलते ये चुनाव महत्वपूर्ण हो चले हैं।
[स्थानी संपादक, बिहार]