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बिहार में फिर गर्माया नाम बदलने का मुद्दा: क्या सच में बदलती है हकीकत या सिर्फ राजनीतिक नैरेटिव का खेल?

Published: Mon, 14 Sep 2026 02:00 AM (IST)

बिहार में शहरों और संस्थानों के नाम बदलने की प्रक्रिया राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन गई है, जहां पहचान और विरासत के नाम पर बहस छिड़ी है।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

एआई द्वारा जेनरेट इमेज।

HighLights

  1. नाम परिवर्तन पहचान, विरासत और राजनीतिक नैरेटिव का खेल।

  2. सांस्कृतिक गर्व, औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति का प्रयास।

  3. आर्थिक बोझ, ध्यान भटकाने और सामाजिक विभाजन का जोखिम।

विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। इतिहास और विरासत का हवाला देते हुए अभी कुछ शहरों-संस्थानों के नाम परिवर्तन की पैरोकारी हो रही।

यह बिहार के लिए लाभप्रद हो या नहीं, लेकिन राजनीति को कोई नुकसान नहीं। दरअसल, राजनीति अपने को इसी तरह से आगे बढ़ाती है।

मांग स्वीकार्य हो जाने पर पहचान-प्रभाव को मजबूती मिलती है, अन्यथा जनमत का आकलन हो जाता है और आवश्यक मुद्दों से जनता का ध्यान भटक जाता है।

इसीलिए ऐसे मामलों में जितना मजा पैरोकारों को आता है, उतना ही विरोधियों को भी। बख्तियारपुर उदाहरण है, जिसका नाम बदले जाने के आग्रह पर दोनों ओर से खूब बतकही हो रही।

बौद्ध धर्मावलंबियों की आश्रय-स्थली होने के बहाने एक समय तो बिहार का नाम भी विहार कर देने का सुझाव आया। जनता के फिरंट होने की आशंका में बात आगे नहीं बढ़ पाई।

पटना भी पाटलिपुत्र नहीं हो पाया, लेकिन बगल में प्रस्तावित सेटेलाइट टाउनशिप को पाटलिपुत्र नाम देकर यह मंशा कुछ हद तक पूरी हो गई। यह सहज स्वीकार्य है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से दोनों नाम एक-दूसरे के स्थानापन्न हैं।

हालांकि, बख्तियारपुर को नीतीशपुर करने के सुझाव पर आपत्ति हो रही। दूसरी ओर गया को जब गयाजी नाम मिला, तो कुछ दिलजलों को छोड़कर चौतरफा स्वागत हुआ।

दरअसल, नाम परिर्वतन से सांस्कृतिक गर्व के साथ थोड़ा-बहुत भ्रम और सामाजिक विभाजन का जोखिम भी रहता है। एक पक्ष इसे गुलामी के प्रतीकों को मिटाकर भारतीय संस्कृति और स्थानीय गौरव को पुनर्जीवित करने की पहल बताता है।

दूसरा इसे असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने, ध्रुवीकरण तेज करने और विरोधियों की पहचान मिटाने का हथकंडा करार देता है। संजय गांधी जैविक उद्यान का जब नाम बदला गया, तो ऐसी ही आपत्ति हुई।

कहा गया कि इससे बेरोजगारी, प्रवासन और दूसरी समस्याएं हल नहीं होतीं। पुराने नाम जुबान पर चढ़े होते हैं। बदलाव से नेविगेशन, दस्तावेज और रोजमर्रा के काम में अस्थायी दिक्कत आती है और आर्थिक बोझ अलग से। कुछ अनुमानों मेंं पटना के नाम परिवर्तन पर खर्च 400 करोड़ रुपये से अधिक का आंका जा रहा।

छोटा नाम सहज 

स्वतंत्रता के बाद पटना में बेली रोड का नाम बदलकर जवाहरलाल नेहरू मार्ग किया गया। बोलचाल में बेली रोड ही रहा, क्योंकि परिवर्तित नाम बड़ा था। फिर वर्ष 2019 मेंं उसे नेहरू पथ नाम मिला। चलन में आज भी बेली रोड ही है।

परिवर्तन की प्रक्रिया

नाम परिवर्तन के लिए राज्य मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनापत्ति अनिवार्य होती है। इसलिए फिलहाल यह मुद्दा प्रशासनिक से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव और वार-पलटवार का आधार बना हुआ है।

पहल और फलाफल 

  1. 1. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मजबूती और औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्ति
  2. 2. स्थानीय महापुरुषों या इतिहास-विरासत के प्रति सम्मान प्रकट करना
  3. 3. विपक्षी प्रतीकों को हटाना और अपनी विचारधारा को स्थापित करना
  4. 4. तात्कालिक मुद्दों से ध्यान हटाकर अपने वोट बैंक को मजबूत करना

हाल-फिलहाल परिवर्तित नाम

पहले अब
राजभवन लोक भवन
मुख्यमंत्री आवास लोकसेवक आवास
गया शहर गयाजी
संजय गांधी जैविक उद्यान पटना जू
संजय गांधी डेरी प्रौद्योगिकी संस्थान बिहार राज्य डेयरी प्रौद्योगिकी संस्थान
मॉडल स्कूल सरस्वती विद्या निकेतन

आगे की मांग

बिहार को विहार/ पटना को पाटलिपुत्र/ बख्तियारपुर को व्यासपुर, मगध-द्वार, नीतीशपुर/ औरंगाबाद को आदित्यनगर या देवधाम/ जहानाबाद को मांडवीनगर/ सुल्तानगंज को अजगैवीनाथ

प्रभाव

  • आर्थिक : साइनबोर्ड, रेलवे/हाई-वे साइनेज, मानचित्र और डिजिटल डेटाबेस (जीआइएस, भूमि व कर रिकार्ड आदि), दस्तावेज, स्टेशनरी-मुहर और पोर्टल बदलना होता है।
  • सांस्कृतिक : सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गर्व (गयाजी का धार्मिक सम्मान, लोक भवन का जन-केंद्रित प्रतीक) सुदृढ़ होता है। पर्यटकीय महत्व बढ़ता है।
  • सामाजिक : स्थानीय पहचान को मजबूती मिलने से सामुदायिक भावना प्रबल होती है। सुदृढ़ समाज हेतु प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती है और आत्मग्लानि की स्थिति नहीं रहती।

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