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बिहार के कोसी क्षेत्र में मखाना क्रांति: बुआई से लेकर वैश्विक बाजार तक की पूरी पड़ताल

Published: Tue, 27 Oct 2026 06:10 PM (IST)

Bihar Makhana Production: बिहार का कोसी क्षेत्र मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र है, जहाँ पारंपरिक तरीकों से खेती होती है। ...और पढ़ें

बिहार के कोसी क्षेत्र में मखाना क्रांति (एआई जेनरेटेड तस्वीर)

बिहार के कोसी क्षेत्र में मखाना क्रांति (एआई जेनरेटेड तस्वीर)

HighLights

  1. कोसी क्षेत्र मखाना उत्पादन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

  2. खेती और प्रसंस्करण में अत्यधिक शारीरिक श्रम लगता है।

  3. उत्पादन बढ़ने से किसानों को मूल्य संबंधी चुनौतियाँ।

डिजिटल डेस्क, पटना। बिहार का कोसी क्षेत्र अपनी अनुकूल जलवायु, प्रचुर जलस्रोतों और उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी के कारण देश भर में मखाना उत्पादन(Bihar Makhana Farming) का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहाँ पारंपरिक तालाबों के साथ-साथ निचले जलजमाव वाले खेतों में मखाना की खेती बड़े पैमाने(Makhana Production in Bihar) पर की जाती है।

खेती और कटाई का चक्र

कोसी क्षेत्र में मखाना की खेती की शुरुआत नवंबर से दिसंबर के दौरान नर्सरी में बीज डालने से होती है। नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद, मार्च से अप्रैल के महीनों में उन्हें मुख्य खेतों या तालाबों में रोपा जाता है। इस प्रकार इसकी मुख्य फसल अवधि मार्च से अक्टूबर तक चलती है। 

फसल की कटाई का सबसे उपयुक्त समय अगस्त से अक्टूबर (विशेषकर अगस्त-सितंबर) होता है। इस दौरान पके हुए कांटेदार बीज पानी के तल में बैठ जाते हैं, जिन्हें अनुभवी किसान जलमग्न सतह से निकालते हैं।

किसानों के सामने गंभीर चुनौतियां

मखाना की खेती और प्रसंस्करण आज भी अत्यधिक शारीरिक श्रम, पारंपरिक तौर-तरीकों और मशीनीकरण की कमी से जूझ रहा है। तालाब की तलहटी से बीजों को एकत्र करने के लिए किसानों को ठंडे पानी और कीचड़ में बार-बार गोता लगाना पड़ता है, जिससे त्वचा और श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा बना रहता है। 

इसके अलावा, बीजों की भुनाई और लावा निकालने के लिए पारंपरिक चूल्हों का उपयोग किया जाता है। अत्यधिक धुएं और भीषण गर्मी में काम करने से मजदूरों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है और उचित तकनीक के अभाव में लगभग 20 से 25% तक फसल बर्बाद हो जाती है।

मखाना निर्माण के चार प्रमुख चरण

तालाब से निकला कच्चा बीज चार व्यवस्थित चरणों से गुजरकर खाने योग्य सफेद मखाना बनता है:

  • सफाई व सुखाई: तालाब से निकाले गए कीचड़युक्त बीजों को रगड़कर धोया जाता है और धूप में सुखाया जाता है, जिससे इनका रंग कत्थई हो जाता है।
  • छंटाई: समान रूप से भूनने के लिए बीजों को छलनी से छानकर आकार (ग्रेड) के अनुसार अलग किया जाता है।
  • उबालना व टेम्परिंग: बीजों को कड़ाही में भूनकर 2 से 3 दिनों तक बोरों में रखा (टेम्परिंग) जाता है, ताकि बाहरी कठोर छिलका भीतर की गुठली से ढीला हो जाए।
  • भूनाई व लावा फोड़ना: अंत में, बीजों को 250 से 300°C के तापमान पर भूनकर तुरंत लकड़ी की थापी से पीटा जाता है, जिससे छिलका फूटकर सफेद, कुरकुरा मखाना बाहर आ जाता है।

आकार और गुणवत्ता के मानक

मखाने के आकार का आकलन पारंपरिक 'सूत प्रणाली' से किया जाता है (1 सूत = 3.175 मिमी)। सूत का नंबर जितना बड़ा होगा, दाना उतना ही बड़ा और महंगा माना जाता है। 

हालांकि, केवल आकार ही नहीं, बल्कि रंग (चमकीला सफेद या हल्का क्रीम), कुरकुरापन (क्रंच), दानों का बिना टूटा होना और स्वच्छता ही इसके वास्तविक ग्रेड और बाजार मूल्य को तय करते हैं। पीला, भूरा या धब्बेदार मखाना कम गुणवत्ता का माना जाता है।

उचित मूल्य और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था

किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए असंगठित बिचौलियों पर निर्भरता घटानी होगी। इसके लिए कच्चे बीजों के बदले खुद प्रोसेसिंग (वैल्यू एडिशन) करके तैयार मखाना बेचना, किसान उत्पादक संगठन (FPO) बनाकर थोक खरीदारों से सीधा जुड़ना और e-NAM जैसे डिजिटल कृषि मंचों का उपयोग करना जरूरी है। 

सहरसा से तैयार मखाना देश के बड़े शहरों में भेजने के लिए रेल मार्ग का व्यापक उपयोग होता है; पुरबिया, जनसेवा और वैशाली एक्सप्रेस जैसी प्रमुख ट्रेनों के जरिए नियमित पार्सल भेजे जाते हैं।

निर्यात के नियम और उत्पादन का बाजार पर असर

विदेशों में सीधा निर्यात(Makhana Export) करने के लिए कारोबारियों को DGFT से इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट कोड (IEC), कीट-मुक्त होने का पादप स्वच्छता प्रमाणपत्र , और रासायनिक अवशेषों की जांच के लिए लैब टेस्ट रिपोर्ट लेना अनिवार्य है।

वर्ष 2025-26 में भारत का कुल मखाना उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष के 63,910 मीट्रिक टन से काफी अधिक है। 

हालांकि, उत्पादन में इस भारी उछाल के मुकाबले मांग उस गति से नहीं बढ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य का अभाव होने से कीमतों में तेज गिरावट देखी गई है, जिसका सीधा असर किसानों और व्यापारियों की आमदनी पर पड़ा है।

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