चेन्नई से सीखा हुनर, बिहार में लॉकडाउन में कारोबार; 22 कैरेट गोल्ड वाली तंजोर पेंटिंग ने बदली कृष्णा दीदी की जिंदगी
शेखपुरा की कृष्णा दीदी ने चेन्नई से तंजोर पेंटिंग का हुनर सीखकर लॉकडाउन में इसे अपना व्यवसाय बनाया। आज वह ...और पढ़ें

कृष्णा दीदी
HighLights
कृष्णा दीदी ने चेन्नई से तंजोर पेंटिंग का हुनर सीखा।
लॉकडाउन में शेखपुरा लौटकर इसे अपना सफल व्यवसाय बनाया।
आत्मनिर्भर बनकर अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं।
डिजिटल डेस्क, पटना/शेखपुरा। कभी नौकरी करने वाली शेखपुरा की कृष्णा दीदी ने अपने हुनर को कारोबार में बदला और आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं। तंजोर पेंटिंग की कला ने उनकी जिंदगी को ऐसा मोड़ दिया कि अब वह खुद अच्छी कमाई करने के साथ दूसरी महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। उनकी कहानी ग्रामीण महिलाओं की बदलती तस्वीर और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल है।
चेन्नई से सीखा हुनर, लॉकडाउन में मिला नया रास्ता
कृष्णा दीदी वर्ष 2016 में तुलसी समूह सहायता से जुड़ी थीं। उनके पति चेन्नई में तंजोर पेंटिंग से जुड़े काम करते थे। इसी दौरान उन्होंने भी यह कला सीखनी शुरू की।
वर्ष 2020 में लॉकडाउन के कारण चेन्नई से वापस शेखपुरा लौटना पड़ा। उस समय उनके पास तंजोर पेंटिंग के अलावा कोई दूसरा हुनर नहीं था।
सरस मेला से शुरू हुआ सफर, पहली बार बिकीं तीन पेंटिंग
घर लौटने के बाद कृष्णा दीदी ने अपने हुनर को कारोबार का रूप देने का फैसला किया। उन्होंने पहली बार गांधी मैदान में आयोजित सरस मेला में अपनी पेंटिंग प्रदर्शित की।
इसके बाद ज्ञान भवन में आयोजित मेले में उन्हें पहली सफलता मिली, जहां उनकी तीन पेंटिंग बिकीं। इस छोटी शुरुआत ने उनका आत्मविश्वास बढ़ा दिया।
अब दिल्ली से गुरुग्राम तक पहुंची कृष्णा की कला
इसके बाद कृष्णा दीदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों में आयोजित मेलों में अपनी तंजोर पेंटिंग प्रदर्शित करती हैं।
उन्हें पेंटिंग के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं। उनकी बनाई अब तक की सबसे महंगी पेंटिंग 2 लाख 75 हजार रुपये में बिक चुकी है।
22 कैरेट गोल्ड से तैयार होती है तंजोर पेंटिंग
कृष्णा दीदी के मुताबिक तंजोर पेंटिंग प्लाई पर बनाई जाती है। सबसे पहले प्लाई पर कपड़ा लगाया जाता है और फिर तीन तरह के पाउडर की कोटिंग की जाती है।
सतह तैयार होने के बाद भगवान की तस्वीर का स्केच बनाया जाता है। इसके बाद 22 कैरेट गोल्ड फॉयल और स्टोन लगाकर पेंटिंग को अंतिम रूप दिया जाता है।
खुद आत्मनिर्भर बनीं, अब महिलाओं को दे रहीं रोजगार
कृष्णा दीदी की सफलता सिर्फ उनकी अपनी कमाई तक सीमित नहीं है। आज वह खुद का कारोबार चला रही हैं और दूसरी महिलाओं को भी काम से जोड़ रही हैं।
उनका सफर बताता है कि सही मंच और हुनर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं रोजगार मांगने वाली नहीं, बल्कि रोजगार देने वाली भी बन सकती हैं।
जीविका के 20 साल में बदली महिलाओं की तस्वीर
ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से 2 अक्टूबर 2006 को बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना यानी जीविका की शुरुआत हुई थी।
आज जीविका से जुड़ी करीब 1.81 करोड़ महिलाएं कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प और दूसरे कारोबारों के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं। कृष्णा दीदी की कहानी इसी बदलाव की एक झलक है।
सरस मेला बना ग्रामीण हुनर का बाजार
किसी भी कारोबार के लिए बाजार सबसे जरूरी है। बिहार सरकार सरस मेले जैसे मंचों के जरिए जीविका दीदियों को अपने उत्पाद ग्राहकों तक पहुंचाने का अवसर दे रही है। कृष्णा दीदी जैसी महिलाओं के लिए यही मंच स्थानीय हुनर को बड़े बाजार से जोड़ने का जरिया बन रहे हैं।
