पटना, आलोक मिश्र। Bihar Coronavirus News जब महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से संक्रमितों की संख्या बढ़ने की खबरें आने लगी थीं, कान तो बिहार के तभी खड़े होने शुरू हो गए थे। लेकिन पिछला एक पखवाड़ा जोर-जोर से ढपली पीट गया है कि अब नहीं चेते तो परिणाम गंभीर होंगे। करीब 15 दिन पहले जहां सक्रिय मरीजों की संख्या लगभग दो हजार थी, वह अब 29 हजार का आंकड़ा पार कर गई है। चिकित्सीय व्यवस्था इतने में ही हाथ पैर फुलाए बैठी दिख रही है। बेड कम पड़ने लगे हैं, अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी है। हर तरफ बस पिछले साल से ज्यादा बड़ी आफत आने का रोना, लेकिन सुरक्षा उपायों को लेकर लापरवाही का आलम। जबकि यह जानने के बाद भी कि खुद की सुरक्षा ही इसकी काट है।

बिहार को इस पखवाड़े के आंकड़ों ने कुछ हद तक डराया है। एक अप्रैल के पहले सब ठीक-ठाक चल रहा था। उस दिन सक्रिय मरीजों की संख्या 1,907 थी। जांच कराने वालों में एक फीसद से कम संक्रमित निकल रहे थे। ठीक होने वालों का प्रतिशत भी 98.69 था, लेकिन धीरे-धीरे आंकड़ों की सूरत बिगड़ने लगी। जैसे-जैसे टेस्ट बढ़े, मरीजों की संख्या में अप्रत्याशित उछाल आने लगा। दस अप्रैल के बाद चार हजार से ज्यादा के आंकड़े जुड़ने लगे। इसके बाद 15 अप्रैल को सर्वाधिक 6,133 मरीज मिले यानी 15 दिनों में 27 हजार से ज्यादा मरीज मिले हैं। जांच में छह फीसद से ज्यादा संक्रमित निकलने लगे हैं, जो अब तक के सर्वाधिक हैं। ठीक होने वालों की संख्या भी गिरकर 91 फीसद के आसपास आ टिकी है। होटल-मेडिकल को छोड़ दुकानें सात बजे बंद करने का फरमान है और मास्क न पहनने पर जुर्माना। लेकिन इससे कुछ होता दिख नहीं रहा, क्योंकि बाजार में सारे मानक टूट रहे हैं। लोग जबरदस्ती बाहर निकलने से बाज नहीं आ रहे। मास्क भी मुंह के बजाए गले में टिका दिखता है।

अस्पतालों में बेड के लिए मारा-मारी की स्थिति बनने लगी है। बेड के लिए जुगाड़ तलाशने पड़ रहे हैं। दो दिन से ऑक्सीजन की कमी को लेकर हाय-तौबा मची है। प्रशासन सबकुछ दुरुस्त बता रहा है। ऑक्सीजन की कमी दूर करने के लिए उद्योगों को सप्लाई बंद कर दी गई है और प्रवाह में गतिरोध बनने वालों पर सरकार महामारी एक्ट के तहत कार्रवाई का मन बना चुकी है। अस्पतालों को भी दोष कैसे दिया जाए, क्योंकि पहले जो स्टाफ केवल कोविड मरीजों पर ध्यान देता था, वह अब टीकाकरण में भी बंटा हुआ है। प्रदेश में टीकाकरण की रफ्तार भले ही 11 से 14 के टीकापर्व में संतोषजनक न रही हो, फिर भी 57 लाख से ज्यादा लोगों को टीके लग चुके हैं। इनमें सात लाख के लगभग दूसरी डोज वाले हैं। टीका पर्व में हर दिन चार लाख को टीका लगाने का लक्ष्य था, लेकिन चार दिन में यह संख्या साढ़े पांच लाख के आसपास ही पहुंच पाई। टीके और इलाज के बीच समूची व्यवस्था को बांटे कोरोना आम और खास में कोई फर्क नहीं कर रहा। मुख्य सचिव से लेकर कई आइएएस इसकी चपेट में हैं। मंत्री और विधायक भी अछूते नहीं हैं।

राजनीतिक आशावादियों को बस अब पंचायत चुनाव का इंतजार है। कोरोना संकट के बीच विधानसभा चुनाव सब देख चुके हैं। इसमें कोरोना कोई खास असर नहीं छोड़ पाया था। आगामी 15 जून तक नई पंचायतों का गठन हो जाना है। इसमें ईवीएम को लेकर भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग में पेंच फंसा था। राज्य निर्वाचन इसके लिए अलग ईवीएम की मांग कर रहा था, जबकि भारत निर्वाचन आयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उपयोग की जाने वाली ईवीएम पर राजी था। मामला उच्च न्यायालय में चला। आखिरकार बुधवार को बातचीत से ही हल निकला।

अब लोकसभा व विधानसभा चुनाव में उपयोग में लाने वाली ईवीएम से ही चुनाव होगा। अब कोरोना पर निर्भर है कि इस बार चुनाव रोक पाता है या विधानसभा की तरह बाइपास दे देता है, लेकिन रफ्तार देख ऐसा लगता नहीं दिख रहा। आशावादी पूरी तरह आश्वस्त हैं कि चुनाव वाले प्रदेशों में इसका असर काफी कम हो जाता है। उत्तर प्रदेश में आबादी ज्यादा होने के बावजूद महाराष्ट्र से कम मरीज हैं तो बस वहां चल रहे पंचायत चुनाव के कारण। बंगाल तगड़ी जनसंख्या वाले राज्यों में शुमार नहीं है तो वहां हो रहे विधानसभा चुनाव के कारण, क्योंकि कोरोना प्रो डेमोक्रेटिक है। जबकि ऐसा नहीं है, बचाव है तो सिर्फ सुरक्षा। अपनी और अपने सामने पड़ने वाले की सुरक्षा। अगर यह होगा तभी अगला सप्ताह कुछ बेहतर हो सकता है।

[स्थानीय संपादक, बिहार]

Edited By: Sanjay Pokhriyal