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सर्दी-खांसी में एंटीबायोटिक ले रहे हैं? संभल जाइए, नहीं तो पड़ सकते हैं लेने के देने

Published: Fri, 06 Feb 2026 10:46 AM (IST)

साधारण सर्दी-खांसी में बिना डॉक्टरी सलाह एंटीबायोटिक लेने से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा बढ़ रहा है। पीएमसीएच और आइजीआइएमएस ...और पढ़ें

सर्दी-खांसी में एंटीबायोटिक बिना सलाह ना लें।

सर्दी-खांसी में एंटीबायोटिक बिना सलाह ना लें।

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जागरण संवाददाता, पटना। साधारण सर्दी, खांसी या बुखार होते ही बिना चिकित्सकीय सलाह एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करने लगते हैं। नतीजा, मामूली बीमारी वाले मरीज गंभीर हालत में निजी के साथ पीएमसीएच और आइजीआइएमएस जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों तक पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञ इसे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) के बढ़ते खतरे से जोड़कर देख रहे हैं।

पीएमसीएच के पल्मोनरी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डा. पवन कुमार अग्रवाल ने बताया कि बीते महीने मुजफ्फरपुर के एक ग्रामीण क्षेत्र से 42 वर्षीय मरीज उपचार के लिए पहुंचा था। मरीज को सर्दी, खांसी और बुखार था।

पास की दवा दुकान से उसने बुखार की दवा के साथ एमोक्सीक्लेव जैसी एंटीबायोटिक ले ली। इसका नतीजा यह हुआ कि मरीज की सांस की तकलीफ बढ़ गई और अन्य जटिलताएं भी सामने आईं, इसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

पीएमसीएच के अधीक्षक डा. राजीव कुमार सिंह और मेडिसिन विभाग के डा. संजय कुमार ने बताया कि नौबतपुर से आए एक मरीज को बुखार होने पर ग्रामीण क्वैक द्वारा तुरंत जोन इंजेक्शन दे दिया गया।

इस गलत उपचार से मरीज की स्थिति और बिगड़ गई और अंततः उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। आइजीआइएमएस में शेखपुरा से उपचार कराने पहुंचे सन्नी कुमार ने बताया कि बाइक से गिरने से उसके पैर में जख्म हो गया था।

स्थानीय दुकानदार ने उन्हें दो-तीन दवा दी, उससे घाव तो सूखा नहीं, ऊपर से पेट खराब हो गया। आइजीआइएमएस में जनरल सर्जरी विभाग में दिखाया, जहां डाक्टर बोले कि गलत एंटीबायोटिक्स चलाया गया था।

बुखार होने पर ग्रामीण क्वैक ने तुरंत जोन इंजेक्शन दे दिया 

विशेषज्ञों की अपील l बिना विशेषज्ञ डाक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक नहीं लें l पूरे कोर्स के बिना दवा नहीं छोड़ें l दवा दुकानों से खुद इलाज करने की प्रवृत्ति से बचें।


बिना पर्ची एंटीबायोटिक व स्टेरायड जैसी दवा विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में यह समस्या अधिक गंभीर है। ग्रामीण दवा दुकानदार भी बिना पर्ची एंटीबायोटिक और स्टेरायड दवाएं दे रहे हैं। इस तरह की दवा काउंटर से सीधे मिल जाना खतरे को और बढ़ा देता है।

डा. पवन कुमार अग्रवाल ने बताया कि सर्दी, खांसी या सामान्य बुखार में लोग एजिथ्रोमाइसिन, सेफिक्सिम और एमोक्सीक्लेव जैसी दवाएं खुद ही लेना शुरू कर देते हैं, जबकि अधिकांश मामलों में ये बीमारियां वायरल होती हैं और इनमें एंटीबायोटिक की कोई जरूरत नहीं होती।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि जब तक पका हुआ कफ न निकले या बैक्टीरियल संक्रमण की पुष्टि न हो, तब तक एंटीबायोटिक नहीं लेनी चाहिए। इससे काफी नुकसान होता है।


50 प्रतिशत मामलों में बेवजह लिखी जा रहीं दवाएं आइसीएमआर की वर्ष 2024 की एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क (एएमआरएसएन) रिपोर्ट बताती है कि सर्दी-जुकाम, खांसी, वायरल बुखार, डेंगू और अन्य वायरल संक्रमणों के 50 प्रतिशत मामलों में एंटीबायोटिक का लाभ नहीं होता।

99 हजार से अधिक कल्चर पाजिटिव नमूनों के विश्लेषण में पता चला कि ‘ई कोलाई’ और ‘क्लेब्सिएला न्यूमोनिया’ जैसे बैक्टीरिया में दवाओं के प्रति संवेदनशीलता घट रही है।

संवेदनशीलता वर्ष 2017 के 81 प्रतिशत की तुलना में 2024 में घटकर लगभग 58% रह गई है।


ब्राड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का प्रयोग भी बड़ी चिंता एक और गंभीर पहलू ब्राड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक का बढ़ता उपयोग है। ब्राड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दवाएं एक साथ कई बैक्टीरिया पर असर करती हैं।

बिना चिकित्सकीय सलाह एंटीबायोटिक लेने से हाेने लगी सांस लेने में तकलीफ

देश के सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में उपयोग हो रहीं कुल एंटीबायोटिक में लगभग 60% इसी श्रेणी की हैं। इससे सामान्य बैक्टीरिया भी बहु-औषधि प्रतिरोधी बनते जा रहे हैं। भारत में हर तीसरा बैक्टीरियल संक्रमण अब एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो चुका है, जबकि वैश्विक औसत हर छठे मामले का है।

देश में एंटीबायोटिक दवाओं का अविवेकपूर्ण इस्तेमाल हो रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रतिदिन डाक्टरों द्वारा औसतन 1.2 करोड़ पर्चे लिखे जाते हैं, जिनमें प्रतिदिन 70 लाख से अधिक चिकित्सीय पर्चों पर एंटीबायोटिक दवाएं लिखी जा रही हैं।

60 प्रतिशत पर्चों में एंटीबायोटिक दवाएं शामिल होती हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार यह अनुपात 30 प्रतिशत से कम होना चाहिए। इसकी बड़ी वजह पेशेवर चिकित्सकों के साथ ही झोलाछाप, पंजीकृत चिकित्सकों व गैर-एलोपैथिक डाक्टरों द्वारा भी मरीजों को छोटी बीमारियों में अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक दवाएं लिखना है।

यही कारण है कि चिकित्सकों के सबसे बड़े संगठन आइएमए को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर एंटीबायोटिक दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की मांग करनी पड़ी है।

आइएमए ने अपने स्तर पर सरकार को इसमें पूरे सहयोग का वादा भी किया है। आइसीएमआर और डब्ल्यूएचओ की निगरानी रिपोर्ट बताती है कि देश में प्रतिदिन 72 लाख पर्चों पर एंटीबायोटिक लिखी जा रही हैं।

डाक्टर भी लिख रहे मानकों से दोगुनी एंटीबायोटिक दवाएं

l 60 प्रतिशत पर्चों पर लिखी जा रहीं एंटीबायोटिक्स, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक है 30 प्रतिशत, आइएमए ने लिखा है पीएम को पत्र l पेशेवर चिकित्सकों के साथ ही झोलाछाप, पंजीकृत और गैर-एलोपैथिक डाक्टर भी अनावश्यक रूप से लिख रहे एंटीबायोटिक्स बिना जांच के गलत दवा देना और अधूरी खुराक लेना एएमआर को तेजी से बढ़ा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नीति, संगठनात्मक अपील और जमीनी चिकित्सकीय व्यवहार के बीच की इस दूरी को पाटे बिना एएमआर के खतरे को थामना संभव नहीं होगा।

डा. अनिल कुमार जे. नायक, अध्यक्ष, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

 

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