पटना [जेएनएन]। अरे ये जो हमारे सबसे प्यारे जेवरात हैं ये तो गुलामी की खास निशानी है। आज इनका प्रयोग खूबसूरती को बढ़ाने की उम्मीद से किया जाता है। कुछ लोगों की राय है कि असल में ये जेवरात गुलामी के तमगे हैं। कुछ ऐसे रोचक वाक्य भारतीय नृत्य कला मदिर के बहुद्देशीय परिसर में महिला कलाकारों द्वार सुनने को मिले। हमारी पुरखिन व प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी रुकैया की चुनिदा रचनाओं का ड्रामाई पाठ 'अबरोध बासिनी' की प्रस्तुति हो रही थी।

मशहूर रंगकर्मी तनवीर अख्तर की रहनुमाई में रुकैया के ख्यालात को निवेदिता, चद्रकाता, नूतन, मोना और नासिरुद्दीन आदि ने पेश किया। ड्रामे की परिकल्पना, डिजाइन एव बाग्ला से ¨हदी और उर्दू और प्रस्तुति आलेख नासिरूद्दीन का रहा। मच का सचालन कर रहे नासिरूद्दीन ने कहा कि रुकैया भारत की महिलाओं खासकर मुसलमान महिलाओं के लिए हक की मिसाल थी। अपनी सोच और लेखनी से महिलाओं की स्थिति को बया करती रही। आज से करीब सौ पहले समाज में जिसमें न कोई राम मनोहर राय, न ईश्वरचद्र विद्यासागर थे तब रुकैया एक लौ की तरह महिलाओं के अधिकार के लिए जलती रही। बगाल इलाके की मुसलमान स्त्रियों के लिए रुकैया राम मनोहर राय जैसी थी। जिस कारण आज भी बगलादेश की स्त्रिया कहती हैं कि रुकैया नहीं होती तो महिलाएं आगे नहीं बढ़ पातीं।

तालीम का मतलब किसी मजहब के पीछे आख बद कर चलना नहीं

रुकैया की चुनिदा रचनाओं को पाठ करते हुए महिला कलाकारों ने कहा कि तालीम का मतलब किसी खास मजहब, या किसी खास जाति के पीछे आख बद कर चलना नहीं। ईश्वर या खुदा ने जो कुदरती शिक्षा दी उसपर लगातार अभ्यास करने की जरूरत है। तालीम का गुण हमें गलत और सही में फर्क करना बताता है। भगवान ने हमें आख, कान, नाक और मन आदि प्रदान किए हैं। हम अभ्यास के दौरान अच्छी चीजों को ग्रहण करें। रुकैया की रचनाओं के पाठ के दौरान कलाकारों ने पुरुषों के बराबर आने के लिए हमें जो भी काम करना होगा हम करेंगे बात पर बल दिया। अगर अपने पैरों पर खड़े होने, आजाद होने और जीविका चलाने के लिए काम करना पड़ा तो करेंगे। अगर जरूरी हुआ तो मजिस्ट्रेट, बैरिस्टर आदी बनकर जिदंगी बसर करने के लिए काम करेंगे।

रुकैया के बारे में परिचित हुए लोग

क्या हम किसी रुकैया को जानते हैं? क्या हम बगाल की किसी रुकैया को जानते हैं या क्या हम बिहार की किसी रुकैया को जानते हैं आदि सवाल सभागार में गूंज रहे थे। कलाकारों ने रुकैया के बारे प्रकाश डालते हुए कहा कि आज से करीब 137 साल पहले बगाल के एक मुस्लिम जमींदार परिवार में जन्म लेने वाली रुकैया कम उम्र से ही महिलाओं के हक में लिखना और काम करना शुरू कर दिया। औरतों को शिक्षा से जोड़ने के लिए रुकैया ने वर्ष 1911 में स्कूल खोला। भारतीय नारीवाद आदोलन की अगुआ लोगों में रुकैया का नाम आता है।

दिखा महिलाओं का दर्द

रचनाओं का पाठ नाटकीय ढंग से महिला कलाकारों ने बखूबी निभाया। बिहार, झारखड, पश्चिम बगाल और बाग्लादेश की महिलाओं की नारकीय जिदंगी को पेश किया। कलाकारों ने छोटी-छोटी कहानियों को हास्य-व्यग्य का सहारा लेकर वर्तमान समाज में महिलाओं की दारूण स्थिति को पेश करते हुए पुरुषवादी समाज पर भर सवाल उठाए। मुस्लिम के साथ ¨हदू महिलाओं में व्याप्त पर्दा प्रथा के नुकसान के साथ मुस्लिम लड़कियों को स्कूल से जोड़ने के अपने मिशन में समाज का विरोध दिखाई दिया।

कैद नहीं हुई खत्म

हम समाज के आधा है हिस्सा है हमारे गिरे-पड़े रहने से समाज तरक्की कैसे करेगा? आदि शब्द गूंज रहे थे। रुकैया की रचना 'सुलताना का ख्वाब' का पाठ रोचक रहा। पाठ में ऐसे लोक की कथा बया की गई जहा सिर्फ स्त्रियों का राज है। स्त्रियों के लिए विश्वविद्यालय है वो अमन के साथ जिंदगी गुजार रही हैं। हवाई इंजन से उड़ती हैं। वे जंग के खिलाफ हैं। सुलताना का ख्वाब करोड़ों महिलाओं की बदहाली और दर्द से निकला ख्वाब था। स्त्रियों की बदहाली और दर्द की शिद्दत उपरी तौर पर भले ही कम दिखता हो मगर खत्म नहीं हुआ है।

By Jagran