पटना [जेएनएन]। वर्षा जल के उपयोग के लिए लंबे समय तक इसे संग्रहित रखने के लिए पौधों का उपयोग सबसे कारगर तरीका है। यह तकनीक प्राचीन बिहार में जल संरक्षण के लिए प्रयोग में लाई जाती थी। पेड़ की जड़ों में लंबे समय पर पानी संचय की क्षमता होती है। उसके साथ-साथ पेड़ के आसपास की मिट्टी में आद्रता हमेशा बनी रहती है। इस विधि का उपयोग दो हजार साल पहले से किया जाता रहा है। तालाब और उसके किनारे वृक्ष लगाना लंबे समय तक जल को संरक्षित रखने की प्रभावशाली तकनीक है। उक्त बातें गुरुवार को जल संरक्षण दिवस पर शिक्षाविद् अतुल कोठारी ने कहीं। कार्यशाला का आयोजन पर्यावरण विज्ञान केंद्र एवं पाटलिपुत्र विज्ञान भारती ने संयुक्त रूप से दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में किया।

कोठारी ने बताया कि शहर में बड़े स्तर पर तालाब अब संभव नहीं हैं। हर घर में वर्षा जल संचयन प्रणाली का विकास कर इसकी भरपाई की जा सकती है। जल संरक्षण के लिए प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर स्थायी समाधान किया जा सकता है।

जल संरक्षण केवल सरकार का जिम्मा मान लेने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इंटरैक्टिव सत्र के माध्यम से छात्रों ने अपने विचार व्यक्त किए। डॉ. राम कुमार ने आर्द्र भूमि में गिरावट और शहरीकरण में वृद्धि पर विस्तार से प्रकाश डाला। इससे पूर्व कार्यशाला का उद्घाटन पीपल का पौधा लगाकर किया गया।

अर्थ बायोलॉजिकल एंडं इनवॉयरनमेंट साइंस डिपार्टमेंट के डीन प्रो. आरएस राठौर ने अतिथियों का स्वागत किया। वक्ताओं ने पारिस्थितिकी के पुनर्निर्माण और झीलों की बदहाल स्थिति को दुरुस्त करने पर बल दिया। उन्होंने परंपरागत भारतीय जल प्रबंधन विधियों को मौजूदा समय में भी प्रासंगिक बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता अरुण कुमार सिन्हा ने की। इस अवसर पर प्रेमनाथ पांडे, डॉ. केसी बाजपेई, डॉ. आतिश पराशर आदि ने विचार रखे।

By Ravi Ranjan