बिहार में शराबबंदी के 10 साल: कागजों पर 'ड्राई स्टेट', जमीनी हकीकत में तस्करी; अपराध और सियासी घमासान
Bihar Sharab Bandi: बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां ...और पढ़ें
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बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे। (जागरण)
HighLights
बिहार में शराबबंदी को लागू हुए 10 साल पूरे।
एनसीएईआर रिपोर्ट ने शराबबंदी की सफलता पर उठाए सवाल।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में ढाई गुना से अधिक वृद्धि।
डिजिटल डेस्क, पटना। Bihar Liquor Ban: बिहार 'ड्राई स्टेट' है, लेकिन जमीनी हकीकत का हर पन्ना एक नया अफसाना बयां करता है। कानूनन तो यहां शराब बेचना; खरीदना और पीना अपराध है, लेकिन बीते रोज पटना में जहरीली शराब पीने से हुई 4 लोगों की मौत ने इसकी पोल खोल दी है।
इतना ही नहीं अगस्त महीने की शुरुआत में ही भोजपुर जिले के आरा में तस्करी कर लाई जा रही शराब की 1 करोड़ रुपये की खेप पकड़ी गई थी। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि हकीकत में न तो जाम छलकने बंद हुए और न ही इसकी तस्करी।
बिहार में शराबबंदी के 10 साल पूरे
चेकपोस्ट से लेकर गलियों तक फैले नेटवर्क, होम डिलीवरी के नए-नए तरीकों और रोजाना होती गिरफ्तारियों के बीच आज बिहार की शराबबंदी एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां नुकसान राजस्व का भी है और कानून-व्यवस्था का भी। इस पर सियासी घमासान भी कम नहीं है।
बिहार के अलावा मिजोरम और नागालैंड जैसे राज्यों में भी शराब पर प्रतिबंध लागू हैं। हाल ही में मणिपुर और गुजरात में प्रतिबंध हटाए गए हैं। बहरहाल, बात करें अपने बिहार की तो यहां शराबबंदी लागू हुए करीब 10 साल बीत चुके हैं।
ऐसे में आइए जानते हैं कि इसका प्रदेश पर क्या कुछ असर पड़ा। सबसे पहले समझते हैं इसे लागू करने के प्रमुख कारण क्या रहे?
शराबबंदी से जुड़ी 4 प्रमुख बातें
- स्वास्थ्य से जुड़े फायदे: बिहार में शराब पर रोक को लेकर लोग तर्क देते हैं कि इससे शराब से जुड़ी बीमारियों, दुर्घटनाओं और मौतों में कमी लाकर लोगों की सेहत में सुधार हो सकता है। जहरीली शराब पीने से मौत जैसी घटनाओं में कमी आ सकती है।
- सामाजिक कल्याण: लोगों का मानना है कि शराब पर रोक लगाने से शराब के गलत इस्तेमाल से जुड़ी सामाजिक समस्याओं, जैसे घरेलू हिंसा, अपराध दर और परिवार के टूटने जैसी दिक्कतों को कम किया जा सकता है।
- सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू: भारत जैसे विविध सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं वाले देश में, कुछ समूह सांस्कृतिक या धार्मिक सिद्धांतों के आधार पर शराब पर रोक की वकालत करते हैं।
- गांधीवादी आदर्श: संविधान का अनुच्छेद 47 स्पष्ट रूप से शराब के सेवन को हतोत्साहित करने का निर्देश देता है।
बिहार में कब लागू हुई शराबबंदी

बिहार में 1 अप्रैल 2016 से शराबबंदी लागू हुई है। इससे पहले बिहार में समाजसेवी और पर्यावरणविद् मनोहर मानव ने शराब के खिलाफ आवाज उठाई थी।
छपरा के सिताबदिरा से साल 2009 में शुरू किए गए शराबबंदी आंदोलन ने बिहार में एक बड़ा रूप ले लिया था। इसके बाद बिहार के तत्कालीन सीएम नीतीश सरकार ने 1 अप्रैल 2016 में शराबबंदी को लागू कर दिया।
NCAER की रिसर्च रिपोर्ट में क्या?
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनामिक रिसर्च यानी NCAER के बिहार से संबंधित एक शोध पत्र में शराबबंदी की मौजूदा नीति पर सवाल उठाए गए हैं।
रिसर्च में दावा किया गया है कि शराबबंदी अपने घोषित लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई है। इसमें आर्थिक और सामाजिक स्तर पर इसके असर का भी विश्लेषण किया गया है।
शराबबंदी पर पहले और अब भी सियासी घमासान
बिहार में इस साल अप्रैल में पूर्ण शराबबंदी के 10 साल पूरे हो गए हैं। इसे लेकर सियासी घमासान भी कम नहीं है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, चिराग पासवान और प्रशांत किशोर सहित कई नेताओं ने बीते दिनों अपने बयानों में शराबबंदी पर सवाल उठाए हैं।
- कानून में कोई बदलाव नहीं होगा: मद्य निषेध विभाग के मंत्री मदन सहनी ने बीती 21 अगस्त को बयान दिया था कि बिहार में शराबबंदी कानून में कोई संशोधन नहीं होगा।
- शराबबंदी पूरी तरह विफल: तेजस्वी यादव ने भी इसी महीने और बीते अप्रैल में भी इसे लेकर बयान दिया था। उन्होंने कई बार शराबबंदी को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बिहार में पूर्ण शराबबंदी को पूरी तरह से विफल और सत्ता पक्ष के संरक्षण में चलने वाला एक बड़ा रैकेट बताया है।
- सफल नहीं हुई शराबबंदी: जेडीयू पार्टी के सीतामढ़ी से सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने मार्च 2026 में इस नीति की समीक्षा की मांग की थी। उन्होंने ने कहा कि शराबबंदी कहीं भी सफल नहीं हुई है।
- हम जीते तो हटेगी शराबबंदी: प्रशांत किशोर (वर्तमान में बांकीपुर सीट से विधायक) भी बिहार से शराबबंदी हटाने की समय-समय पर वकालत करते रहे हैं। एक बयान में उनका कहना था कि यदि उनकी पार्टी बिहार में सरकार बनाती है तो वह बिहार से शराबबंदी पूरी तरह से हटा देंगे।
- कानून की समीक्षा की जरूरत: लोजपा (रा) प्रमुख चिराग पासवान ने हाल ही में बिहार में शराबबंदी कानून के 10 साल पूरे होने के बाद इसकी समीक्षा करने की मांग की है।
- अपनाएं गुजरात मॉडल: हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी बिहार में शराबबंदी पर कई बार सरकार पर हमलावर हो चुके हैं। उन्होंने सरकार को कई बार हिदायत दी है कि बिहार को गुजरात मॉडल अपनाना चाहिए।
- शराबबंदी सिर्फ दिखावा: अप्रैल 2026 में जनशक्ति जनता दल के संस्थापक तेज प्रताप यादव ने भी शराबबंदी पर सवाल उठाए थे। तेज प्रताप यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि बिहार में शराबबंदी सिर्फ एक दिखावा है।
शराबबंदी से घटे क्राइम के मामले?
बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा को रोकने के लिए साल 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि राज्य में शराबबंदी के बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के बजाय ढाई गुना से ज्यादा बढ़ गए हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट में 2012 से 2024 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़ों का ट्रेंड सामने रखा गया है। आंकड़ों के मुताबिक 2012 में करीब 11 हजार मामले थे।
जो 2014 में करीब 15.5 हजार, 2021 में करीब 18 हजार, 2022 में करीब 20 हजार और 2023 में करीब 23 हजार तक पहुंच गए। 2024 में यह संख्या करीब 28 हजार बताई गई है। यानी लंबे समय में दर्ज मामलों में बढ़ोतरी हुई है।
आंकड़ों पर एक नजर
| वर्ष | महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामले (लगभग में) |
|---|---|
| 2012 | करीब 11 हजार मामले |
| 2014 | करीब 15.5 हजार मामले |
| 2015 | करीब 14 हजार |
| 2016 | करीब 12 हजार |
| 2018 | करीब 17 हजार |
| 2019 | करीब 15.5 हजार |
| 2021 | करीब 18 हजार |
| 2022 | करीब 20 हजार |
| 2023 | करीब 23 हजार |
| 2024 | करीब 28 हजार मामले |
(नोट- हालांकि, इन आंकड़ों से यह नहीं कहा जा सकता कि महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ने की एकमात्र वजह शराबबंदी रही। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे अपराध के आंकड़ों पर शिकायत दर्ज होना और पुलिस में रिपोर्टिंग का असर पड़ता है।)
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