नगर के गांधी इंटर विद्यालय के मैदान में चल रही रामकथा के दौरान रविवार को स्वामी प्रभजनानंद जी महाराज ने कहा कि धर्म को अलग से करने की बजाए प्रत्येक कर्म को धर्ममय करना सीखों। आज हमारी प्रार्थना एक्शन बनकर रह गई है। जबकि होना यह चाहिए प्रत्येक एक्शन प्रार्थना जैसी हो जाए। हमारा व्यवहार, आचरण, बोलना, सुनना, देखना, सोचना सब इतना लयबद्ध और ज्ञान मय हो कि यह सब अनुष्ठान जैसा लगने लगे।

धर्म के लिए अलग से कर्म करने की आवश्यकता नहीं, अपितु जो हो रहा है उसी को ऐसे पवित्र भाव से करें कि वही धर्म बन जाए। वस्तु की तुलना कर लेना, मगर अपने भाग्य की कभी भी किसी से तुलना मत करना। अधिकांश लोगों द्वारा अपने भाग्य की तुलना दूसरों से कर व्यर्थ का तनाव लिया जाता है। इसके बाद उस परमात्मा को ही सुझाव दिया जाता है कि उन्हें ऐसा नहीं , ऐसा करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि परमात्मा से शिकायत मत किया करो। हम अभी इतने समझदार नहीं हुए हैं कि उनके इरादे समझ सकें। अगर उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली की है तो चिता मत करना, क्योंकि शायद वह पहले से कुछ बेहतर उसमें डालना चाहते हों। परमात्मा भाग्य का चित्र अवश्य बनाता है मगर उसमें कर्म रूपी रंग तो खुद ही भरा जाता है। रामकथा के पांचवें दिन भरत के त्याग और समर्पण पर चर्चा की गई। जिसे सुन श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे।

Posted By: Jagran

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