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15 साल बाद भी ‘लाइफलाइन’ नहीं बन सका नालंदा का VIMS, सुविधाओं के अभाव में मरीज बेहाल

Published: Wed, 15 Apr 2026 04:16 PM (IST)

पावापुरी स्थित भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान (विम्स) को 15 साल हो गए हैं, लेकिन यह अभी भी अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने में विफल है।

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समय कम है?

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संक्षेप में पढ़ें

संवाद सूत्र, पावापुरी। पावापुरी स्थित भगवान महावीर आयुर्विज्ञान संस्थान (विम्स) ने स्थापना के 15 वर्ष पूरे कर लिए हैं। स्थापना दिवस पर जहां एक ओर संस्थान परिसर में कार्यक्रम आयोजित किए गए, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि इतने वर्षों के बाद भी यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है।

करीब 600 से अधिक बेड वाले इस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रतिदिन नालंदा, नवादा और शेखपुरा जिलों से 2500 से 3000 मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और अव्यवस्था के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। कभी क्षेत्र की ‘लाइफलाइन’ माने जाने वाला यह अस्पताल अब खुद बदहाली से जूझता नजर आ रहा है।

सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों का अभाव

अस्पताल में हृदय, मस्तिष्क और नसों से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। कार्डियक सर्जन, न्यूरोलॉजिस्ट, नेफ्रोलॉजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और पल्मोनोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञों की भारी कमी बनी हुई है। स्थिति यह है कि यहां पीजी स्तर तक की पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन सुपर स्पेशियलिटी की एक भी शाखा शुरू नहीं हो सकी है।

जांच सुविधाओं का भी संकट

  • अस्पताल में जरूरी जांच सुविधाएं भी नदारद हैं।
  • इको की सुविधा नहीं।
  • 24 घंटे अल्ट्रासाउंड उपलब्ध नहीं।
  • एंडोस्कोपी वर्षों से लंबित।
  • कलर डॉप्लर जांच का अभाव, सामान्य स्टूल जांच भी उपलब्ध नहीं है।

मरीजों को छोटी-छोटी जांच के लिए निजी लैब का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उनका खर्च बढ़ रहा है।

इलाज कम, रेफरल ज्यादा

मरीज के साथ आए स्वजन का आरोप है कि गंभीर मरीजों को प्राथमिक उपचार के बाद पटना के बड़े अस्पतालों ,पीएमसीएच और आईजीआईएमएस में रेफर कर दिया जाता है। इतना ही नहीं इतने बड़े अस्पताल में डायलिसिस सुविधा नहीं होने से किडनी मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। उन्हें निजी केंद्रों पर महंगा इलाज कराना पड़ रहा है।

ट्रामा सेंटर नहीं, हादसों में खतरा

राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े इस क्षेत्र में सड़क दुर्घटनाएं आम हैं, लेकिन अस्पताल में ट्रामा सेंटर की सुविधा नहीं है। घायलों को तत्काल विशेषज्ञ इलाज नहीं मिल पाता, जिससे ‘गोल्डन आवर’ का कीमती समय निकल जाता है।

अल्ट्रासाउंड के लिए लंबा इंतजार

अल्ट्रासाउंड जांच के लिए मरीजों को करीब एक महीने तक इंतजार करना पड़ता है। सीमित समय तक सेवा उपलब्ध रहने से समस्या और बढ़ जाती है। इमरजेंसी वार्ड के पास की छत जर्जर है, जिससे हादसे का खतरा बना हुआ है। वहीं, अस्पताल का सेंट्रल एसी सिस्टम पिछले तीन वर्षों से ठप है, जिससे मरीजों को भीषण गर्मी में परेशानी झेलनी पड़ रही है।

प्रशासन का पक्ष

अस्पताल प्रशासन के अनुसार फिलहाल सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं और एंडोस्कोपी, डायलिसिस व कलर डॉप्लर जैसी सुविधाएं भी नहीं हैं। जर्जर भवन की मरम्मत के लिए बीएमआईसीएल को पत्र भेजा गया है और अनुमति मिलने के बाद कार्य शुरू किया जाएगा।

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