विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बिहार की जेल में गजब का खेल: जमानत किसी को, रिहा हो गया पिता का हमनाम कैदी; 7 दिन बाद खुली पोल... तीन जेलकर्मी सस्पेंड

Published: Fri, 09 Oct 2026 11:15 AM (GMT+05:30)Updated: Fri, 09 Oct 2026 12:18 PM (GMT+05:30)

बिहारशरीफ मंडल कारा में जमानत पर रिहाई के दौरान बड़ी चूक सामने आई, जहां एक कैदी की जगह दूसरे को ...और पढ़ें

दो अक्टूबर को सतीश की रिहाई, दूसरे बंदी ने किया सरेंडर

दो अक्टूबर को सतीश की रिहाई, दूसरे बंदी ने किया सरेंडर

HighLights

  1. बिहारशरीफ जेल में जमानत पर रिहाई में हुई बड़ी चूक।

  2. नाम की समानता के कारण गलत कैदी को रिहा किया गया।

  3. लापरवाही सामने आने पर तीन जेलकर्मी निलंबित, जांच जारी।

जागरण संवाददाता, बिहारशरीफ (नालंदा)। बिहारशरीफ मंडल कारा में कैदी की पहचान और रिहाई प्रक्रिया में ऐसी चूक सामने आई है, जिसने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत से जमानत एक बंदी को मिली, लेकिन जेल से रिहा दूसरा कैदी हो गया।

आरोप है कि नाम और पिता के नाम में समानता के कारण यह गड़बड़ी हुई। हैरानी की बात यह रही कि 24 सितंबर को हुई इस चूक का पता जेल प्रशासन को करीब सात दिनों तक नहीं चला।

एक अक्टूबर को रिपोर्ट तैयार होने के बाद मामला सामने आया। इसके बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया और जांच शुरू की गई।

जमानत के आदेश में एक नाम, जेल के गेट से निकला दूसरा कैदी

जेल सूत्रों के अनुसार, अस्थावां थाना कांड संख्या 203/26 और 201/26 के आरोपित सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद बिहारशरीफ मंडल कारा में बंद थे।

इसी जेल में अस्थावां थाना कांड संख्या 362/25 का आरोपित चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद भी बंद था। बताया जाता है कि सतीश चौहान के पिता का नाम भी चंद्रदीप है।

आरोप है कि इसी नाम की समानता के कारण रिहाई के समय पहचान में गड़बड़ी हुई। नतीजा यह हुआ कि अदालत से जमानत पाने वाले सतीश की जगह दूसरा बंदी चंद्रदीप जेल से बाहर चला गया।

सात दिन तक रिकॉर्ड में नहीं पकड़ में आई गड़बड़ी

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गंभीर सवाल यह है कि रिहाई के बाद करीब एक सप्ताह तक गलती का पता क्यों नहीं चल सका। 24 सितंबर को बंदी को रिहा किया गया, लेकिन एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट तैयार होने के बाद गड़बड़ी सामने आई।

तब पता चला कि जमानत पाने वाले सतीश चौहान जेल में ही बंद हैं, जबकि उनकी जगह दूसरा कैदी बाहर जा चुका है। इस घटनाक्रम ने कैदी की पहचान, दस्तावेजों के मिलान और रिहाई के अंतिम सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए।

दो अक्टूबर को सतीश की रिहाई, दूसरे बंदी ने किया सरेंडर

मामले का खुलासा होने के बाद जेल प्रशासन ने रिकॉर्ड और रिहाई से जुड़े घटनाक्रम की पड़ताल शुरू की। इसके बाद दो अक्टूबर की सुबह जमानत पाने वाले वास्तविक कैदी सतीश चौहान को विधिवत रिहा किया गया।

दूसरी ओर, गलत पहचान के कारण जेल से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना ने भी उसी दिन स्थानीय अदालत में सरेंडर कर दिया।

वह दोपहर करीब तीन बजे अदालत पहुंचा। इस तरह रिहाई में हुई गलती सामने आने के बाद दोनों बंदियों की स्थिति स्पष्ट हुई, लेकिन इस चूक ने जेल की सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

दूसरे मामले में जमानत लंबित होने की बात भी आई सामने

सूत्रों के मुताबिक, गलत तरीके से जेल से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना के खिलाफ दो अलग-अलग आपराधिक मामले दर्ज थे।

इनमें से एक मामले में उसे जमानत मिली थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत लंबित थी। इसके बावजूद वह जेल से बाहर निकल गया।

बाद में दूसरे मामले में जमानत लंबित होने की जानकारी सामने आने पर वह अदालत पहुंचा और सरेंडर कर दिया। इस पहलू ने रिहाई से पहले बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों की स्थिति की जांच किए जाने को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट होगी।

पहचान से लेकर जमानत आदेश तक, कई स्तरों पर जांच जरूरी

मामले में मुख्य सवाल यह है कि रिहाई के समय कैदी की पहचान का मिलान किस आधार पर किया गया। क्या अदालत के आदेश में दर्ज नाम, पिता का नाम और अन्य पहचान संबंधी विवरणों की ठीक से जांच हुई थी?

क्या संबंधित बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों की स्थिति सत्यापित की गई थी? यदि रिहाई से पहले दस्तावेजों की जांच की गई थी, तो गलत बंदी जेल से बाहर कैसे निकल गया?

इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। फिलहाल यह मामला केवल नाम की समानता तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि रिहाई की पूरी प्रक्रिया में संभावित चूक की पड़ताल की जरूरत को भी सामने लाता है।

कांग्रेस नेता ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग

मामले की जानकारी सामने आने के बाद एक स्थानीय कांग्रेस नेता ने वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देकर पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी।

आवेदन में जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और रिहाई प्रक्रिया में हुई कथित लापरवाही की जांच कराने की मांग उठाई गई। मामले में कैदी की पहचान, अदालत के जमानत आदेश और अन्य लंबित मामलों की स्थिति जैसे पहलुओं की जांच अहम मानी जा रही है।

यह भी पता लगाना होगा कि गलती किन परिस्थितियों में हुई और क्या रिहाई की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया था।

जेल अधीक्षक की रिपोर्ट पर तीन जेलकर्मी सस्पेंड

मामले की गंभीरता को देखते हुए बिहारशरीफ मंडल कारा के अधीक्षक ने संबंधित ड्यूटीकर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा। उनके जवाब और प्रारंभिक जांच के आधार पर जेल अधीक्षक ने मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी।

इसी रिपोर्ट के आधार पर कारा महानिरीक्षक (जेल आईजी) ने तीन जेलकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। मुख्यालय कारा प्रशासन के अनुसार, जेल प्रशासन की ओर से चूक हुई है और जेल अधीक्षक की अनुशंसा पर तीन वार्डनों को निलंबित किया गया है।

अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि पहचान और रिहाई की प्रक्रिया में चूक कैसे हुई और इसके लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी तय होती है।