समस्तीपुर, अजय पांडेय। चेहरे मुरझाए और थके-हारे। खौफ कोरोना का। भूखे पेट, सूखे कंठ, जख्मी पांव..। आखों में पानी..जगह-जगह दिख रही यही कहानी। नाम बदलते.. किरदार नहीं, कथानक बदलता, संवाद नहीं। यात्र उम्मीद भरी..मंजिल एक। जो छूट गया वो अपना नहीं रहा, आगे का पता नहीं..जो साथ था, बस वही अपना।

 2003ये वे लोग हैं, जिन्होंने कई बाधाओं को पार कर अपनी सरजमीं पर पांव रखा है। एक-दो नहीं, सैकड़ों। रोजी-रोटी की तलाश में वषों से बाहर रह रहे लोग आपदा की इस घड़ी में घर पहुंच रहे। कुछ पैदल, कुछ गाड़ी से। चाह एक ही, बस अपनों के बीच पहुंच जाएं।

जिंदगी कभी इतनी भयावह न थी

कोलकाता में बिताए उन 10 दिनों को याद करते बिथान के पारस (बदला हुआ नाम) कहते हैं.. रोज कमाते, रोज खाते थे। टके के हिसाब से जीवन कटता। जिंदगी इस कदर भयावह होगी, पता न था। पूरा शहर बंद हो गया। लोग घरों में सिमट गए। हाथ रिक्शा था, मालिक ने उसे भी ले लिया। रिक्शा नहीं तो रोटी नहीं। सिर पर छत थी नहीं, फुटपाथ पर सोते तो पुलिस भगाती। कहते-कहते पारस भावुक हो जाते। बताते हैं कि 20 मार्च को पता चला कि कुछ ट्रक बिहार जानेवाला है। हमारे जैसे कई लोग ठीकेदार से मिलने गए। आरजू-मिन्नत की, जब जाकर कुछ बात बनी। आखिरी विकल्प के लिए जो कुछ बचाकर रखा था, वह सब लगा दिया, तब जाकर अपनी मिट्टी नसीब हुई।

परिवार की चिंता थी, इसलिए पैदल निकल गए

गोपालगंज के रास्ते गोरखपुर से पैदल आनेवाले मोहनपुर के मुरारी (बदला हुआ नाम) की पीड़ा ज्यादा है। साथ में परिवार था। दो छोटे बच्चे भी। गोलघर की एक दुकान पर काम करते थे। दुकान बंद, नौकरी खत्म। कमाया हुआ एक सप्ताह में खत्म हो गया। विपरीत घड़ी में मालिक का व्यवसाय ठप होने की दलील। आपदा में घर आने के सिवा कोई उपाय नहीं था। गाड़ी-घोड़ा बंद, अपना पांव ही सहारा।

 परिवार की चिंता थी, सो पैदल ही निकल गए। कंधे पर सामान, पीठ पर बच्चा और समयकाल में लंबी होतीं सड़कें। रास्ते में लोगों ने हमदर्दी दिखाई, लेकिन दूर से ही। खाने-पीने को दे दिया तो ठीक, नहीं तो बिस्कुट और पानी के भरोसे कदम बढ़ते रहे। बच्चों और प}ी की वजह से ठहराव लेकर चलते थे। रात होती तो कहीं मंदिर या स्कूल में ठहर जाते। चौथे दिन हमलोग समस्तीपुर में प्रवेश कर गए। यहां अस्पताल में चेक कराया। सब ठीक है, क्वारंटाइन सेंटर में ठहराया गया है..बस 14 दिन कट जाने का इंतजार है।

Posted By: Murari Kumar

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