मुजफ्फरपुर, जेएनएन। इग्नू दिल्ली के समकुलपति डॉ.सत्यकाम ने कहा है कि शोध करने वाले छात्रों को पुस्तकालय संस्कृति से बाहर निकलना होगा तभी वे अपने विषय की वास्तविकता से परिचित होंगे। अनुसंधान के लिए मौलिकता और नूतनता आवश्यक है। इसके लिए तथ्य के जड़ों तक जाना एक शोधार्थी का मूल लक्ष्य होना चाहिए ताकि अनुसंधान आविष्कार का पर्याय बन सके। वे बीआए बिहार विश्वविद्यालय ¨हदी विभाग की ओर से पुस्तकालय सीनेट हॉल डॉ.गोपाल राय व ¨हदी कथालोचना विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

 कहा कि डॉ.गोपाल राय ऐसे साहित्यकार व आलोचक रहे जिन्होंने फील्ड वर्क किया तथा विषय की वास्तविकता को समझा। उनके जीवन से नए छात्रों को सीख लेने की जरूरत है। शोधार्थी को पुरातत्ववेत्ता बनना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय ¨हदी शिक्षण संस्थान व केंद्रीय ¨हदी संस्थान आगरा के विभागाध्यक्ष प्रो.उमापति दीक्षित ने कहा कि साहित्यकार डॉ.गोपाल राय की कृति युग-युगांतर तक जीवंत रहेगी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य को समर्पित किया। गोदान, रंगभूमि, शेखर एक जीवनी, मैला आचल, दिव्य महाभोज आदि श्रेष्ठ उपन्यासों पर आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं। हिंदी कहानी और उपन्यास के व्यापक फलक को अपनी समीक्षा दृष्टि से समृद्ध किया है।

 पद्मश्री उषा किरण खान ने कहा कि डॉ.राय का जीवन काफी संघर्षशील रहा। वे नए रचनाकारों को भी अपनी समीक्षा में शामिल करते थे। अध्यक्षता ¨हदी विभागाध्यक्ष डॉ.पूनम सिन्हा ने की। बीज वक्तव्य डॉ.चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने दिया। संगोष्ठी चार सत्रों में हुई। संचालन क्रमश: डॉ.त्रिविक्रम नारायण सिंह, डॉ.कल्याण कुमार झा, डॉ.संजय पंकज व डॉ.संत साह ने किया। सहायक प्राध्यापक डॉ.राकेश रंजन, डॉ.उज्ज्वल आलोक, डॉ.संध्या पांडेय, डॉ.सुकांत कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

 मौके पर ¨हदी उपन्यास में लोक संस्कृति पर केंद्रित स्मारिका का विमोचन किया गया। इनक रही भागीदारी कुलसचिव सेवानिवृत्त कर्नल अजय कुमार राय, निदेशक प्रो.मनेंद्र कुमार, प्रो.जंगबहादुर पांडेय, डॉ.रेवतीरमण, रामनरेश पंडित, प्रो.कुमारी शकुंतला, प्रो.प्रमोद कुमार, डॉ.सुंदेश्वर दास, डॉ.रंजना कुमारी, डॉ.दशरथ प्रजापति, डॉ.नागेन्द्र सिंह, डॉ.राजीव कुमार, अखिलेश कुमार, प्रो.देवव्रत अकेला, मीनाक्षी मीनल आदि।

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