दो बेटियां, दो शहर और एक सवाल, प्यार की राह में जाति की दीवार कितनी ऊंची?
Bihar Intercaste Marriage Case: पूर्णिया में एक पिता ने अंतरजातीय विवाह करने वाली अपनी जीवित बेटी का अंतिम संस्कार और ...और पढ़ें

Purnea and Muzaffarpur Living Daughter Funeral: जिस तरह से रिया की तस्वीर के साथ शवयात्रा निकाली गई उसी तरह से मुजफ्फरपुर में भी किया गया था। फाटो: इंटरनेट मीडिया

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, मुजफ्फरपुर। Social Reform In Bihar: इस दुनिया में बाप और बेटी के बीच के प्यार से बड़ा शायद ही कुछ दूसरा हो। किसी भी कारण से जब इसमें दरार पड़ जाती है तो इसका परिणाम भी दुनिया देखती है।
जैसा पूर्णिया जिले के केनगर प्रखंड स्थित गंगोली पंचायत के चपय गांव निवासी रिया के मामले में देखने मिल रहा है।
मुजफ्फरपुर में भी हुई थी घटना
अपने प्यार को पाने के लिए परिवार व समाज की राय से अलग राह अपनाने ओर उसके बाद सामने आए भयंकर परिणाम का यह पहला मामला नहीं है। बिहार के मुजफ्फरपुर में मई 2026 में इस तरह की घटना हो चुकी है।
मड़वन प्रखंड अंतर्गत जियन खुर्द गांव में एक पिता ने अपनी बेटी के गैर जाति में शादी करने के बाद उसे मृत मानते हुए अंतिम संस्कार कर दिया था।
जिस बेटी के पैदा होने के बाद उन्होंने नेग बांटे थे। जिसकी हंसी के आगे उन्हें दुनिया की सभी खुशी कम लगती थी। उसने जब कोर्ट में उनके अरमान और उम्मीद के विपरीत बयान दिया तो दिल बैठ गया। उन्होंने बेटी के जिंदा रहते ही कफन सिलने का फैसला कर लिया।

कोर्ट में बयान के बाद सब खत्म
पूर्णिया जिला अंतर्गत केनगर प्रखंड की गंगोली पंचायत के चपय गांव निवासी मनोज गोस्वामी की पुत्री रिया विगत 8 सितंबर को अपने गांव के ही दिलीप पासवान के पुत्र मिलन के साथ भाग गई।
अलग अलग जाति से होने के बाद भी दोनों ने शादी कर ली। इस बीच मामला पुलिस तक पहुंचा और उसने दोनों को बरामद कर 12 सितंबर को कोर्ट में पेश किया।
पिता के अरमान की मौत
यहां रिया ने अपने पिता की अपेक्षा के विपरीत अपने पति के पक्ष में बयान दिया। खुद को बालिग बताते हुए अपनी मर्जी से शादी करने की बात कही। इसके बाद कोर्ट ने उसे पति के साथ जाने की अनुमति प्रदान कर दी।
बेटी की खुशी के लिए पूरे समाज से लड़ने वाले पिता का दिल यहां फट गया।
अदालत में बेटी के दिए बयान से आहत पिता ने घर लौटते वक्त मन ही मन एक फैसला लिया। उन्होंने घर पहुंचने के बाद अपने स्वजन से इसकी चर्चा की और तय किया कि वह उनके लिए सदा के लिए मृत हो चुकी है।

समाज को शामिल किया
इसके लिए उन्होंने 15 सितंबर को पूरे गांव को इस बात की जानकारी दी। फिर अपनी जीवित पुत्री का पुतला बनाया और रिया की तस्वीर के साथ शवयात्रा निकाली। इसके बाद श्मशान में उस पुतले को मुखाग्नि देकर उसके अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की गई।
इसके अनुसार ही उन्होंने 17 सितंबर को वैदिक विधि से श्राद्ध की प्रक्रिया पूरी की। पंडिता की मौजूदगी में वेदी बनाकर मंत्रोच्चार के बीच पिता ने सपरिवार मुंडन कराया ओर गंगाजल, तिल , कुश व जौ के साथ जीवित पुत्री का पिंडदान भी कर दिया।
श्राद्ध भोज भी किया
रोचक बात यह है कि इसे केवल प्रतीकात्मक नहीं रखा गया। वरन सही मायने में यह एक श्राद्ध लगे इसके लिए सभी रिश्तेदारों को आमंत्रित करने के साथ ही साथ गांव के लोगों को श्राद्ध भोज का न्योता भी दिया गया।
आने वालों को भोजन कराया गया। आयोजन स्थल से मात्र तीन घर दूर अपने ससुराल में बैठी जीवित बेटी के लिए इस अनोखे श्राद्ध भोज के बारे में जो भी सुना, अवाक रह गया। उसने तरह तरह से इसकी व्याख्या की।

मुजफ्फरपुर की घटना कुछ कम नहीं
कुछ ऐसा ही दृश्य चार माह पहले यानी मई 2006 में मुजफ्फरपुर के मड़वन स्थित जियन खुर्द गांव में देखने को मिला था। यहां की युवती ने भी अलग राह चुनने का फैसला किया था। अंतरजातीय विवाह का फैसला किया।
इसके बाद गांव के लोगों ने उसके परिवार को समाज से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
उनका तर्क यह था कि यदि सबकुछ सहज रूप में होगा तो आगे और भी युवतियां इस राह पर चलेंगी। इससे समाज बर्बाद हो जाएगा। इस सोच के साथ पंचायत ने युवती के पिता के सामने एक प्रस्ताव रखा।
जिसके बाद उन्होंने अपनी जीवित पुत्री से सभी संबंध को खत्म करते हुए उसका अंतिम संस्कार कर दिया था। उस समय भी इसी तरह से युवती की तस्वीर के साथ अर्थी के साथ शवयात्रा निकाली गई थी। पुताल को मुखाग्नि दी गई थी। उसके बाद विधान के अनुसार श्राद्ध किया गया था।
अंतरजातीय विवाह का विरोध
इस संबंध में वहां के मुखिया विकास कुमार सिंह ने कहा कि समाज की सहमति से प्रतीकात्मक रूप से शवयात्रा निकाली गई थी और उसके अनुसार ही सभी कर्म किए गए थे। दूसरी जाति में शादी की बढ़ती प्रवृति के प्रति विरोध दर्ज कराने के लिए ऐसा किया गया।

पूर्णिया हो या मुजफ्फरपुर केवल भूगोल बदला। नहीं बदला तो बेटियों का फैसला लेने के हक को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलने की परंपरा। जब एक पिता ने अपने कंधे पर अर्थी उठाई तो वह कोई मृत शरीर नहीं था। उस रखी थी एक आहत पिता और समाज का अहंकार।
