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पितृपक्ष 27 सितंबर से, घर पर इस विधि से करें तर्पण, गयाजी में श्राद्ध से पितरों को मिलता मोक्ष

Published: Sat, 19 Sep 2026 03:30 PM (IST)

Shradh Vidhi Rules: पितृपक्ष 27 सितंबर 2026 से शुरू होकर 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगा, जिसमें पूर्वजों के प्रति श्रद्धा ...और पढ़ें

पितरों की सेवा, तर्पण और पिंडदान को परम कल्याणकारी माना गया है।

पितरों की सेवा, तर्पण और पिंडदान को परम कल्याणकारी माना गया है।

HighLights

  1. पितृपक्ष 27 सितंबर 2026 से 10 अक्टूबर तक चलेगा।

  2. घर पर कुश, गंगाजल से तर्पण करने की विधि।

  3. गयाजी में पिंडदान से पितरों को मोक्ष मिलता है।

अमरेन्द्र तिवारी, मुजफ्फरपुर। Pitru Paksha 2026: सनातन धर्म में पूर्वजों यानी पितरों की सेवा, तर्पण और पिंडदान को परम कल्याणकारी माना गया है।

शास्त्रों के अनुसार नित्य तर्पण का विधान है, लेकिन आधुनिक जीवन शैली और समयाभाव के कारण लोग इसे प्रतिदिन नहीं कर पाते। इसी को ध्यान में रखते हुए ऋषियों ने वर्ष में एक विशेष पक्ष पूर्वजों को समर्पित किया है, जिसे पितृपक्ष या महालय कहा जाता है।

27 सितंबर से शुरुआत

कर्मकांडी आचार्य रामजन्म पाण्डेय के अनुसार, इस वर्ष पितृपक्ष आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा यानी रविवार, 27 सितंबर 2026 से आरंभ हो रहा है।

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इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 (आश्विन अमावस्या, शनिवार) को होगा। इस दौरान श्रद्धालु अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट कर तर्पण करेंगे।

कर्ण से जुड़ी परंपरा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष की परंपरा की शुरुआत महाभारत काल से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि दानवीर कर्ण की मृत्यु के पश्चात जब उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची, तो उन्हें भोजन के स्थान पर केवल सोना और आभूषण दिए गए।

व्याकुल होकर कर्ण ने जब यमराज से इसका कारण पूछा, तो यमराज ने बताया कि उन्होंने जीवनभर केवल स्वर्ण दान किया और अपने पूर्वजों को कभी अन्न-जल नहीं दिया।

15 दिनों का विधान

कर्ण ने यमराज से कहा कि वे अपने पूर्वजों के विषय में अनभिज्ञ थे। तब यमराज ने उन्हें अपनी भूल सुधारने के लिए 15 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा।

इन 15 दिनों में कर्ण ने श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का स्मरण कर श्राद्ध और अन्न-जल का दान किया। तभी से शास्त्रों में 15 दिवसीय पितृपक्ष का विधान सुनिश्चित हुआ।

घर पर पिंडदान

शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष में नित्य तर्पण, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और दान करने से पितृदोष तथा ग्रहबाधाओं से मुक्ति मिलती है।

यदि कोई व्यक्ति विशेष परिस्थितियों के कारण बाहर नहीं जा सकता, तो वह घर के दक्षिण मुखी पवित्र स्थान पर कुश, गंगाजल, काले तिल, जौ और दूध मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण कर सकता है। इसके बाद कौआ, गाय, कुत्ता, चींटी और देव (पंचबलि) के लिए भोजन निकालकर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।

मोक्षधाम गया का महत्व

सनातन परंपरा में मोक्षधाम गया (बिहार) को पिंडदान के लिए सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च स्थल माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान गया जी के फल्गु तट पर ही संपन्न किया था।

तीर्थों पर श्राद्ध फल

गया के अतिरिक्त काशी, प्रयागराज, बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल और हरिद्वार जैसे प्रमुख तीर्थ धामों पर किया गया पिंडदान सीधे पितरों को मोक्ष प्रदान करता है।

मान्यता है कि इन पवित्र स्थानों पर श्राद्ध कर्म करने से परिवार की प्रगति के मार्ग की सभी बाधाएं दूर होती हैं।

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