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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 14, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Kudhni By-election: केवल मुकेश सहनी ही नहीं वोटकटवा...ओवैसी की पार्टी में भी समीकरण बिगाड़ने का माद्​दा

By Prem Shankar MishraEdited By: Ajit kumar
Published: Mon, 14 Nov 2022 12:44 PM (IST)

Kudhni Assembly By-election 2022 कम अंतर से जीत-हार का गवाह रही इस सीट पर असदुद्दीन ओवैसी फैक्टर महत्वपूर्ण साबित हो ...और पढ़ें

दोनों प्रमुख गठबंधनों की परीक्षा होगी। फाइल फोटो
दोनों प्रमुख गठबंधनों की परीक्षा होगी। फाइल फोटो

मुजफ्फरपुर, जासं। एक साल में राज्य में तीसरी एवं जिले में दूसरी बार विधानसभा सीट पर उपचुनाव हो रहा है। पिछले माह हुए उपचुनाव में गोपालगंज और मोकामा की अपनी-अपनी सीट बचाने के बाद कुढ़नी भाजपा और महागठबंधन के लिए लिटमस टेस्ट से कम नहीं है। वहीं छोटे दलों को भी अहमियत साबित करने का मौका होगा। कम अंतर से जीत-हार का कई बार गवाह रही इस सीट पर मुकेश सहनी के साथ असदुद्दीन ओवैसी फैक्टर महत्वपूर्ण होगा। वीआइपी और आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमएइएम) अगर मजबूत उम्मीदवार को मैदान में उतार देता है तो मुकाबला रोचक हो जाएगा।

महज 712 वोटों से जीत

पिछले चुनाव में मजबूत समीकरण के बावजूद राजद उम्मीदवार अनिल सहनी महज 712 वोटों से जीत दर्ज कर सके थे। इसमें 10 हजार से अधिक वोट ओवैसी समर्थित रालोसपा उम्मीदवार रामबाबू सिंह ने ही काटे थे। वहीं, सहनी उम्मीदवार होने का लाभ अनिल सहनी को मिल गया था। मुकेश सहनी के एनडीए में होने के बावजूद उन्हें इस जाति के वोट मिले थे। भाजपा उम्मीदवार को अपेक्षाकृत सहनी वोट नहीं मिले थे। जबकि मुकेश सहनी के साथ ही सांसद अजय निषाद ने मोर्चा संभाला था। ऐसी स्थिति में दोनों छोटे दलों की उम्मीदवारी से बड़े दलों के वोटों में सेंधमारी तय है।

दुखती रग पर हाथ रखने को तैयार दल

महागठबंधन ने मनोज कुशवाहा को जदयू प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारने का निर्णय ले लिया है। अब नजर भाजपा की ओर है। पिछला चुनाव हारने वाले केदार गुप्ता का नाम पहले नंबर पर है। यह इसलिए भी कि उन्होंने वर्ष 2015 में राजद, जदयू व कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मनोज कुशवाहा को 11 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हराया था। पिछले तीन चुनाव का यह सबसे बड़ा अंतर है। वर्ष 2010 में मनोज कुशवाहा एनडीए उम्मीदवार के रूप में मुश्किल 1500 वोटों से जीत दर्ज कर सके थे। लोजपा के उम्मीदवार बिजेंद्र चौधरी को उन्होंने पराजित किया था।

मुस्लिम वोटरों की अच्छी खासी संख्या

कुशवाहा की इस जीत में कांग्रेस उम्मीदवार शाह आलम शब्बू ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उनके 12 हजार वोट ने एनडीए उम्मीदवार मनोज कुशवाहा को कम अंतर की जीत दिलाई थी। ये वोट निश्चित रूप से एनडीए उम्मीदवार के विरोध में जाते। 12 वर्ष पुरानी स्थिति फिर बन सकती है अगर ओवैसी किसी बड़े कद के नेता को प्रत्याशी बनाए। विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों की अच्छी खासी संख्या है। वैश्य के बाद इसकी ही संख्या सर्वाधिक है। महागठबंधन उम्मीदवार की मजबूती इस बात पर होगी कि इस वोट में सेंधमारी नहीं हो। वहीं करीब 30 हजार भूमिहार मतदाता भाजपा उम्मीदवार के लिए महत्वपूर्ण होंगे। बोचहां उपचुनाव में इस वर्ग की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी।

मुकेश सहनी देख रहे बागियों की राह

वहीं विधानसभा आमचुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार को यहां पूर्ण समर्थन नहीं मिला था। मामूली अंतर से हार का यह भी एक कारण था। वीआइपी की नजर इस वर्ग पर होगी। टिकट की उम्मीद पाले कई दिग्गज पाला बदल सकते हैं। ऐसे में मुकेश सहनी उन्हें अपने साथ ला सकते हैं। ऐसे में अपनी जाति के साथ भूमिहार को साधकर वह भाजपा के वोटबैंक में सेंधमारी कर सकते हैं। यहां फिर सांसद अजय निषाद और मुकेश सहनी की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी। दूसरी ओर भाजपा के लिए चिराग का सीधे तौर पर साथ आना शुभ संकेत माना जा रहा है। एक साथ सभी अनुसूचित जातियों को जोड़ दें तो यह संख्या सर्वाधिक होती है। आम चुनाव में चिराग ने अपना अलग उम्मीदवार दिया था, मगर प्रदर्शन निराशाजनक था। भाजपा के साथ आने से उनका प्रभाव दिख सकता है। वोटों के इस गुणा-भाग के बीच यह उपचुनाव काफी रोचक होने की उम्मीद है।

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