मुजफ्फरपुर, आनलाइन डेस्क। Know Your District: दरभंगा बिहार के उन जिलों में है जो आजादी से पहले ही अस्तित्व में आ गया था। यह 1875 में तिरहुत से अलग होकर नया जिला बना था। उस समय मधुबनी और समस्तीपुर भी इसके हिस्से थे। जो बाद के वर्षों में यानी वर्ष 1972 में स्वतंत्र रूप से जिले बनाए गए। यह 1908 तक पटना डिवीजन का हिस्सा था। दरभंगा सदर, बहादुरपुर, बहेरी, हयाघाट, हनुमान नगर, जाले, सिंघवारा, केवटी, मनीगाछी, तारडीह, बेनीपुर, अलीनगर, बिरौल, गौरा बौराम, किरतपुर, घनश्यामपुर, कुशेश्वर स्थान व कुशेश्वर स्थान पूर्व से मिलकर यह जिला बना है। इसके उत्तर में मधुबनी, दक्षिण में समस्तीपुर, पूर्व में सहरसा और पश्चिम में मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी जिला है। इस जिले का नामाकरण दरभंगा शहर के नाम से हुआ है।

कोई प्रमाणिक दस्तावेज नहीं

दरभंगा का नाम कैसे पड़ा इसके बारे में कोई प्रमाणिक दस्तावेज नहीं है। कुछ लोग दरभंग खान की बात करते हैं तो कुछ द्वार बंगा की। बंगाल की संस्कृति से मिथिला में बहुत समानता है। सीधे तौर पर जुड़ाव नहीं होने के बाद भी बहुत कुछ एक जैसा है। मछली और पान के प्रति दोनों का प्रेम पूरी दुनिया में ख्यात है। इसको देखते हुए द्वार बंगा की बात को व्यावहारिक रूप से माना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं। द्वार बंगा यानी 'बंगाल का द्वार'।

एक परिसर में दो विश्वविद्यालय

वैसे भी दरभंगा शहर दरभंगा के महाराजा का है। शासकीय तौर पर सबकुछ लहेरियासराय में है। दरभंगा राज की वजह से शहर की ऐतिहासिक पहचान है। राज क्षेत्र के महल, मंदिर, पार्क, उद्यान और तालाब शहर को सूबसूरत बनाता है। महाराजाओं द्वारा निर्मित कई महल हैं। उनमें नरगौना पैलेस, रामबाग पैलेस, आनंदबाग भवन और बेला पैलेस प्रमुख हैं। कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा और ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के उपयोग में भी कई इमारतें हैं। एलएन मिथिला विश्वविद्यालय ने पुराने राज पुस्तकालय का अधिग्रहण कर लिया है। शायद दरभंगा भारत का एकमात्र शहर है जिसके एक परिसर में दो विश्वविद्यालय हैं। दरभंगा के महाराजा पारंपरिक रूप से कला और साहित्य के बहुत बड़े संरक्षक रहे हैं। इसके साक्ष्य हर ओर नजर आते हैं। शिक्षा का भी उन्होंने खूब विकास किया।

एयरपोर्ट ने विकास को नई ऊंचाई दी

कभी यह जिला पान, मछली और मखान के व्यापार के लिए प्रसिद्ध होता था, लेकिन अब इसने अपनी प्रगतिशील पहचान कायम की है। शैक्षणिक पहचान के साथ ही साथ मेडिकल के क्षेत्र में इसकी अच्छी धाक है। एयरपोर्ट ने भी यहां के विकास को नई ऊंचाई देने का काम किया है। दरभंगा एक नगर निगम वाला शहर है। वर्तमान में दरभंगा जिले के साथ-साथ दरभंगा संभाग का मुख्यालय है। यह बिहार का पांचवां सबसे बड़ा शहर है। यह उत्तर बिहार के सबसे महत्वपूर्ण जिलों में से एक है। दरभंगा को मिथिलांचल का दिल भी कहा जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जिले की कुल जनसंख्या 39 लाख 37 हजार 385 थी। जिसमें 20 लाख 59 हजार 949 पुरुष और 18 लाख 77 हजार 436 महिलाएं थीं। दरभंगा टाउन की जनसंख्या 3 लाख 71 हजार 356 थी। दरभंगा जिले का कुल क्षेत्रफल 2279 वर्ग किमी है।

पर्यटन स्थल

अहिल्या स्थान: इसका संबंध रामायण काल से बताया जाता है। यह जाले प्रखंड स्थित कमतौल रेलवे स्टेशन के दक्षिण में है। इस जगह को अहिल्या ग्राम के नाम से जाना जाता है। यहां के बारे में ख्यात है कि जब भगवान राम जनकपुर जा रहे थे तो उनके पैर एक पत्थर को छू गए। जिससे वह औरत में बदल गया। मान्यता है कि उनके पति गौतम ऋषि ने अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दिया था। यह मंदिर गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को समर्पित है। हर साल रामनवमी और विवाह पंचमी के अवसर पर बड़े मेले आयोजित किए जाते हैं।

देकुलीधाम

यह बिरौल ब्लाक का हिस्सा है। भगवान शिव के बड़े मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां हर रविवार को भक्तों का तांता लगा रहता है। शिवरात्रि के अवसर पर एक बड़ा वार्षिक मेला आयोजित किया जाता है।

कुशेश्वर स्थान

इसका संबंध भी भगवान शिव से ही है। यहां का मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। पूरे वर्ष तीर्थयात्री इस स्थान पर पूजा के लिए आते हैं। न केवल दरभंगा वरन आसपास के जिलों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

श्यामा मंदिर

श्यामा मंदिर दरभंगा रेलवे स्टेशन से सिर्फ एक किमी दूर है। यह ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय कैंपस में स्थित है। वास्तव में यह दरभंगा राज परिवार का निजी कब्रिस्तान है। इस पर मंदिरों का निर्माण किया गया है। इसे 1933 में बनाया गया था। इस मंदिर में देवी काली की एक विशाल मूर्ति विराजमान है।

कुशेश्वरस्थान पक्षी अभ्यारण्य

यहां प्रवासी पक्षियों की लगभग 15 दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियां आती हैं। ये आठ से अधिक देशों से यहां पहुंचती हैं। नवंबर से मार्च के बीच इनका आना होता है। दरभंगा शहर से यह लगभग 45 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।

महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय

महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय 16 सितंबर 1977 को स्थापित किया गया था। यह दरभंगा रेलवे स्टेशन के पश्चिम दक्षिण में स्थित है। इस संग्रहालय में सोमवार को छोड़कर हर दिन जाया जा सकता है। इसके खुलने और बंद होने का समय क्रमश: सुबह 10.00 बजे और दोपहर 3.30 बजे है। कोई प्रवेश शुल्क नहीं है।

चंद्रधारी संग्रहालय

इस संग्रहालय की स्थापना 7 दिसंबर 1957 को मानसरोवर झील के उत्तरी तट पर की गई थी। रंती द्योढ़ी (मधुबनी) के स्वर्गीय चंद्रधारी सिंह ने सभी कलाकृतियों और अन्य दुर्लभ वस्तुओं को दान कर दिया थो। इसे 1974 में डबल स्टोरी बिल्डिंग में स्थानांतरित कर दिया गया। संग्रहालय में आने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। यह सोमवार को छोड़कर हर दिन जनता के लिए खुला रहता है।  

Edited By: Ajit Kumar

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