मुजफ्फरपुर। भारत की राजभाषा ¨हदी है। कई दशक पहले अंग्रेज चले गए, लेकिन अंग्रेजी यहीं छोड़ गए। सोसायटी में ¨हदी बोलने में लोगों को हिचक होती है। सो, अंग्रेजी न बोलने वाले भी अंग्रेजीदां ¨हदी बोलते हैं। अंग्रेजी का दिखावा भारतीय भाषाओं की तुलना में ज्यादा प्रभावी है। यही कारण है कि मध्य एवं निम्न वर्ग के लोग अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा भी अंग्रेजी में दिलाने के लिए सभी प्रकार के सामाजिक व आर्थिक त्याग करने को तैयार हैं। हिंदी की राह में सबसे बड़ी रुकावट वह झिझक है, जिसकी वजह से उच्च शिक्षित माहौल में हम हिंदी बोलने से कतराते हैं।

¨हदी सहज व सरल भाषा :

विश्वविद्यालय के ¨हदी विभाग के वरिष्ठ शिक्षक डॉ. सतीश कुमार राय का कहना है कि बहुत से लोग अंग्रेजी अशुद्ध बोलते व लिखते भी हैं, लेकिन ¨हदी को लेकर उनके मन में यह भय है कि उसकी वर्तनी व उच्चारण अशुद्ध हो जाएगा। इसके चलते बहुत से लोग ¨हदी-अंग्रेजी मिलाकर बोलते हैं। ¨हदी वैश्रि्वक भाषा बन चुकी है। देश के बाहर 30 विश्वविद्यालयों में ¨हदी का अध्ययन-अध्यापन होता है। सिर्फ राजनीति कारणों से ¨हदी का विरोध है। ¨हदी कमजोर नहीं हुई है, बल्कि संकीर्ण मानसिकता की वजह से अपने ही घर में बेगानी बनी हुई है।

अंग्रेजी के प्रति रुझान की वजह :

विवि के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. एसके पॉल कहते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य, इंजीनिय¨रग, तकनीकी और व्यापार आदि अब ग्लोबल हो गए हैं। पूरे विश्व में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या अधिक है। लोगों ने इसे महसूस किया कि अंग्रेजी सीखनी चाहिए। पूरे विश्व की यह एक साझा भाषा है। व्यापार तेज हुआ है। अनेक देशों के बीच आपसी संबंध बढ़ाने में यह एक महत्वपूर्ण भाषा है। इसके बाद भी ¨हदी का महत्व कम नहीं है। यह तेजी से बढ़ रही है।

आत्ममंथन की जरूरत : एमडीडीएम कॉलेज की प्राचार्य डॉ. ममता रानी कहती हैं, ¨हदी को व्यवहार में नहीं उतार पाते हैं। ¨हदी पढ़ने वालों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसकी विवेचना करनी होगी। ¨हदी के प्रति अगर रुझान कम होता जा रहा है तो कहीं न कहीं हम शिक्षकों को आत्ममंथन करने की जरूरत है।

¨हदी की उपेक्षा से बढ़ रही अंग्रेजी : छात्रा शुभम प्रिया, वंदना राय, अंजली साह, सुप्रिया, गोल्डी कुमारी, रामनिवास दुबे व सिद्धि का कहना है कि इस देश में बौद्धिकता का जामा पहने कुछ अंग्रेजीदा लोगों के बीच यह फैशन प्रचलन में है कि वे ¨हदी में बात करेंगे, लिखेंगे, पढ़ेंगे तो तौहीन होगी। एमडीडीएम कॉलेज के इंद्र कुमार दास बताते हैं कि उनके यहां सारा कामकाज और पत्राचार ¨हदी में ही होता है। यह अपने देश की भाषा है। इसमें हमें काम करना चाहिए।

Posted By: Jagran

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप