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Bihar News: मुजफ्फरपुर में अनोखा केस, 200 रुपये के लिए 48 साल तक लड़ाई 

Published: Sun, 01 Nov 2026 10:21 PM (IST)

मुजफ्फरपुर में बंदूक लाइसेंस के लिए 200 रुपये रिश्वत मांगने का 48 साल पुराना मामला पुलिस की लापरवाही के कारण ...और पढ़ें

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

इसमें प्रतीकात्मक तस्वीर लगाई गई है।

HighLights

  1. पुलिस की लापरवाही से 48 साल पुराना मामला बंद।

  2. बंदूक लाइसेंस के लिए 200 रुपये रिश्वत का आरोप।

  3. अनुसंधान अधिकारी ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया।

जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। बंदूक के लाइसेंस के लिए 200 रुपये की रिश्वत मांगने के 48 साल पुराने मामले में पुलिस की लापरवाही से विशेष निगरानी कोर्ट ने केस को बंद कर दिया है।

पुलिस की लापरवाही व अनुसंधान में सुस्ती का यह मामला चर्चा बना है। यह घटनाक्रम 1978 का है। पारू थाने के गोपालपुर गांव निवासी अवधेश प्रसाद सिंह ने बंदूक के लाइसेंस के लिए आवेदन दाखिल किया था। इसके सत्यापन की जिम्मेदारी संबंधित थाने के तत्कालीन थानाप्रभारी बच्चा सिंह को सौंपी गई थी।

आरोप है कि सत्यापन के एवज में उन्होंने 200 रुपये की रिश्वत मांगी। इसपर सूचक ने निगरानी में आठ जून 1978 को मामला दर्ज कराया। जांच का जिम्मा पुलिस निरीक्षक आरके सिंह को सौंपा गया था।

हालांकि, इसके बाद जो हुआ वह पुलिसिया कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। आइओ ने करीब पांच दशक के लंबे अंतराल के बाद भी कोर्ट में प्रगति प्रतिवेदन, अंतिम प्रपत्र या आरोप पत्र दाखिल नहीं किया।

अदालत में लगातार विभिन्न तिथियों पर सुनवाई होती रही और आइओ को चार्जशीट दाखिल करने के लिए बार-बार निर्देश दिए। कई बार रिमाइंडर भी जारी किया।

अंतिम रूप से नौ अक्टूबर 2026 को रिमाइंडर जारी किया गया। पुलिस महकमे की नींद नहीं खुली और न ही अनुसंधान पूरा कर आरोप पत्र दाखिल किया गया। कोर्ट ने सुनवाई में पाया कि वाद संस्थित होने के बाद से लगातार अंतिम प्रपत्र दाखिल करने का निर्देश के बाद भी पुलिस या अभियोजन पक्ष कोई संतोषजनक सूचना या जवाब नहीं दिया।

स्थिति यह है कि अभिलेख के प्रमुख पन्ने जीर्णशीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं। वे पढ़ने योग्य भी नहीं बचे हैं। आदेश में स्पष्ट किया कि संबंधित थाने व उसके पुलिस पदाधिकारियों की लचर कार्यप्रणाली को देखते हुए निकट भविष्य में इस मामले में किसी भी प्रकार की ठोस कार्रवाई की कोई उम्मीद नहीं बची है।

इन परिस्थितियों व तथ्यों का बारीकी से अवलोकन के बाद वाद का निष्पादन परोक्ष रूप से किया जाना ही न्यायसंगत होगा। इस निर्देश के साथ वाद का निष्पादन कर दिया है कि भविष्य में यदि किसी भी प्रकार का कोई भी नया तथ्य या साक्ष्य संबंधित थाने की ओर से कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता तो उसे अभिलेख का हिस्सा मानते हुए तत्कालीन न्यायालय द्वारा आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी।

वाद से जुड़े अभिलेख को इस हिदायत के साथ रिकार्ड रूम में सुरक्षित कराया जाए कि मूल फाइल आगामी 10 वर्षों तक किसी भी स्थिति में नष्ट न की जाए।

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