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कभी कहलाता था 'धान का कटोरा', अब बूंद-बूंद पानी को तरस रहे; मुंगेर के 3 पंचायतों में परती रह गए 150 एकड़ खेत

Published: Fri, 18 Sep 2026 03:53 PM (IST)

मुंगेर का संग्रामपुर, जो कभी 'धान का कटोरा' कहलाता था, अब कमजोर मानसून और ध्वस्त सिंचाई व्यवस्था के कारण पानी की कमी झेल रहा है।

बूंद-बूंद पानी को तरस रहे खेत

बूंद-बूंद पानी को तरस रहे खेत

HighLights

  1. संग्रामपुर में कमजोर मानसून से धान की खेती प्रभावित।

  2. सिंचाई व्यवस्था ध्वस्त, 150 एकड़ खेत परती पड़े।

  3. अवैध खनन से नदियों की प्राकृतिक संरचना बदली, सिंचाई बाधित।

आनंद चौहान, संग्रामपुर (मुंगेर)। कभी धान की लहलहाती फसलों से पहचाने जाने वाले संग्रामपुर को ऐसे ही ‘धान का कटोरा’ नहीं कहा जाता था। बदुआ और बेलहरनी नदी की धार से निकलने वाली सिंचाई डांढ़ खेतों तक पानी पहुंचाती थी। बदुआ जलाशय बनने के बाद सिंचाई व्यवस्था और मजबूत हुई तो किसान खुशहाल हुए। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। 

कमजोर मानसून, ध्वस्त सिंचाई व्यवस्था और खेतों तक पानी नहीं पहुंचने से इस बार धान की पैदावार की उम्मीद धूमिल पड़ती दिख रही है। प्रखंड में करीब छह हजार हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य है। सरकारी आंकड़ों में 99 प्रतिशत खेतों में धान की फसल लगने का दावा है, लेकिन जमीनी हकीकत में करीब 80 प्रतिशत क्षेत्र में ही किसी तरह रोपनी हो सकी है। 

कई जगहों पर खेत पानी के अभाव में परती रह गए। किसानों ने देर से हुई वर्षा के बीच जैसे-तैसे रोपनी की, लेकिन बाद में हुई मूसलधार वर्षा में कई जगह नई रोपनी की गई फसल खेत में खड़ी भी नहीं हो सकी।

तीन पंचायतों में खेत परती

बढ़ौनियां, कटियारी और कुसमार पंचायत में सिंचाई के अभाव में बड़े भूभाग में धान की रोपाई नहीं हो सकी। करीब 150 एकड़ जमीन पर धान की फसल नहीं लग पाई। राजकीय बीज गुणन प्रक्षेत्र की करीब साढ़े छह एकड़ जमीन भी पानी के अभाव में परती पड़ी है। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हैं। चिलचिलाती धूप के बीच खेतों में नमी बनाए रखना भी चुनौती बन गया है।

खनन से मर गई सिंचाई डांढ़

ग्रामीणों के अनुसार कभी बदुआ और बेलहरनी नदी से निकलने वाली सिंचाई डांढ़ खेतों की प्यास बुझाती थी। लेकिन नदियों में बेतरतीब बालू उत्खनन से उनकी प्राकृतिक संरचना बदल गई। नदी की गहराई बढ़ने के साथ सिंचाई डांढ़ धीरे-धीरे मृतप्राय होती चली गई। बदुआ जलाशय से विकसित सिंचाई व्यवस्था भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ती गई। नतीजा यह कि पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद किसान बारिश पर निर्भर हैं।

इस बार कम उपज की आशंका

कभी जिस संग्रामपुर की पहचान धान के कटोरे के रूप में थी, वहां अब किसानों को अपनी कटोरी भरने की चिंता सताने लगी है। प्रखंड कृषि पदाधिकारी अभिनव कुमार ने बताया कि इस बार वर्षा कम हुई है। इनका कहना है कि 99 प्रतिशत क्षेत्र में धान की रोपनी हुई है। कुछ पंचायतों में पानी के अभाव में खेत परती रह गए हैं। उन्होंने माना कि इस वर्ष धान की उपज 2024-2025 के मुकाबले कम होने की संभावना दिख रही है।

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