पत्थरों में मिले प्राचीन इतिहास के संकेत, मुंगेर की पहाड़ियों में जियो-मैपिंग की तैयारी, अब खुलेगा 1500 साल का राज
Munger Dharhara Archaeological Heritage Survey Geo Mapping Black Stones: मुंगेर के धरहरा की पहाड़ियों में सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत के वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता की उम्मीदें बढ़ी हैं।

Munger Dharhara Archaeological Heritage Survey Geo Mapping Black Stones: मुंगेर के धरहरा स्थित पहाड़ियों में पुरातात्विक संभावनाओं को तलाशते वैज्ञानिक और मिले प्राचीन शिलाखंड।
HighLights
मुंगेर की धरहरा पहाड़ियों में प्राचीन ऐतिहासिक विरासत के संकेत।
पुरातत्वविदों के दौरे से वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता की उम्मीदें बढ़ीं।
जियो-मैपिंग और उत्खनन से 1500 साल पुराने रहस्य उजागर होंगे।
संवाद सहयोगी,धरहरा (मुंगेर)। बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत धरहरा की विशाल पहाड़ियों और दुर्गम वनांचलों में छिपी सदियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत अब लोकमान्यताओं के दायरे से निकलकर वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता के धरातल पर आने को तैयार है। देश-विदेश के पुरातत्वविदों और विशेषज्ञों की टीम के हालिया दौरे के बाद क्षेत्र के अनछुए इतिहास की परतों को उघाड़ने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
पैसरा, खोपावर, बंगलवा, माताडीह और कोल काली जैसे स्थानों पर बिखरे प्राचीन शिलाखंड, काले पत्थर, पुरानी स्थापत्य संरचनाएं और सदियों से चली आ रही मान्यताओं ने इतिहास की नई कड़ियों की खोज के स्पष्ट संकेत दिए हैं।
हालांकि, इन पुरास्थलों को 1500 वर्ष पुराना बताने या किसी विशिष्ट कालखंड से जोड़ने की आधिकारिक पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे और उत्खनन की आवश्यकता है।
मुंगेर जिले के धरहरा की पहाड़ियों (पैसरा, खोपावर, बंगलवा, माताडीह व कोल काली) में दबे 1500 साल पुराने रहस्य से उठेगा पर्दा
विशेषज्ञों के दौरे के बाद अब जियो-मैपिंग, जीपीएस लोकेशन ट्रेसिंग और काले पत्थरों की वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया होगी शुरू
भगवान बुद्ध के विश्राम व तपस्या से जुड़ी लोकमान्यताओं को प्रमाण के स्तर पर परखने के लिए विस्तृत पुरातात्विक शोध की आवश्यकता
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सुकन्या के अनुसार राज्य स्तरीय अधिकारियों के दौरे के बाद सर्वे और उत्खनन पर मंथन तेज
विशेषज्ञों के शुरुआती दौरे के बाद अब मुख्य जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि इन पहाड़ियों का सुव्यवस्थित हेरिटेज सर्वे कब और कैसे शुरू होगा। आगामी योजना के तहत अत्याधुनिक जियो-मैपिंग (Geo-Mapping) के माध्यम से संभावित पुरास्थलों की सटीक जीपीएस लोकेशन दर्ज की जाएगी।
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इसके साथ ही पहाड़ियों व गांवों में बिखरे दुर्लभ काले पत्थरों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा, जिससे उनके प्राकृतिक स्रोत, भूगर्भीय प्रकार और यह पता लगाया जा सके कि क्या इनका इस्तेमाल प्राचीन काल में मूर्तियों, शिलालेखों या ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में किया गया था।
लोककथाओं से निकलकर साक्ष्यों तक पहुंचेगा भगवान बुद्ध से जुड़ा इतिहास
स्थानीय परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं में पैसरा सहित आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों को प्राचीन धार्मिक व आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। जनश्रुतियों के अनुसार, भगवान बुद्ध ने अपने भ्रमण के दौरान धरहरा के इन शांत पहाड़ी अंचलों में विश्राम किया था और तपस्या की थी।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के इस दौरे ने इन प्राचीन मान्यताओं को प्रमाण के स्तर पर जांचने का मार्ग प्रशस्त किया है। यदि आगामी सर्वे के दौरान शिलालेख, प्राचीन सिक्के, बुद्ध मूर्तियां, पुरानी ईंटें, स्थापत्य अवशेष या मृदभांड (प्राचीन मिट्टी के बर्तन) मिलते हैं, तो उनकी कार्बन डेटिंग और तुलनात्मक जांच से इस क्षेत्र की सटीक समय-सीमा और सभ्यता का निर्धारण हो सकेगा।
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विभागीय स्तर पर मंथन शुरू, उत्खनन से उजागर होगी पुरानी सभ्यता
इस पुरातात्विक पहल को लेकर स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि राज्य सरकार यहां व्यवस्थित उत्खनन कराती है, तो क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता, नगरीय व्यवस्था और तत्कालीन जीवनशैली के उत्कृष्ट नमूने दुनिया के सामने आ सकते हैं।
मामले में जानकारी देते हुए जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सुकन्या ने बताया कि राज्य स्तरीय अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का पहला प्राथमिक दौरा सफलतापूर्वक संपन्न हो चुका है। इससे क्षेत्र की ऐतिहासिक संभावनाओं पर विभागीय चर्चा शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में राज्य मुख्यालय के निर्देशानुसार यह स्पष्ट होगा कि यहां किस स्तर पर जियो-मैपिंग, पुरातात्विक सर्वे या उत्खनन का कार्य शुरू किया जाएगा।
