गंगा मैया सब बहा ले गेलै बाबू... कुछो नै बचलै! मुंगेर में बाढ़ पीड़ितों की तिरपाल तले कट रही जिंदगी
मुंगेर के जाफरनगर सीताचरण गांव के बाढ़ पीड़ित परिवार गंगा के उफान में सब कुछ गंवाकर पिछले एक सप्ताह से ...और पढ़ें

बास गीत पर्चा का आवेदन दिखाती रानी देवी व उसकी पुत्री। .जागरण।
HighLights
मुंगेर के बाढ़ पीड़ित परिवार गंगा में सब कुछ गंवा चुके।
पिछले एक सप्ताह से पार्क में तिरपाल के नीचे रह रहे।
प्रशासनिक मदद नहीं मिली, अधिकारी बोले अब राहत संभव नहीं।
मनोज कुमार, मुंगेर। गंगा नदी के उफान में सब कुछ गंवा चुके मुंगेर सदर प्रखंड के जाफरनगर सीताचरण गांव के तीन दर्जन से अधिक विस्थापित परिवारों के लिए बाढ़ का पानी घटने के बाद भी जिंदगी की राह आसान नहीं हुई है।
पिछले एक सप्ताह से ये परिवार समाहरणालय के समीप स्थित केसी सुरेन्द्र पार्क में खुले आसमान के नीचे तिरपाल का तंबू तानकर रहने को मजबूर हैं। गंगा की विनाशकारी लहरों ने इनका फूस का आशियाना और खेतों में लहलहाती ढाई बीघा मकई की फसल निगल ली।
मुंगेर सदर प्रखंड के जाफरनगर सीताचरण गांव के तीन दर्जन से अधिक परिवार समाहरणालय के समीप केसी सुरेन्द्र पार्क में तंबू तानकर रहने को मजबूर
फूस के घर और ढाई बीघा खेत की मकई फसल डूबी; सात दिनों से कोई सरकारी सहायता न मिलने से स्वयंसेवी संस्थाओं के चूड़ा-चीनी के भरोसे पेट भर रहे लोग
रानी देवी और बिन्टुल सिंह का दर्द: जलावन बिके तो जलता है चूल्हा, बासगीत पर्चा मिलने के बाद भी अब तक नहीं मिली जमीन
बाढ़ राहत नोडल पदाधिकारी कमल कुमार का बयान: राहत रिपोर्ट फाइनल कर विभाग को भेजी जा चुकी है, अब नया सामुदायिक किचन संभव नहीं
अब इनके पास बची हैं तो महज कुछ बकरियां, एक खटिया, जरूरी कागजात वाला बक्सा और जलावन की सूखी लकड़ियां। सात दिनों से प्रशासनिक मदद न मिलने के कारण बच्चे और महिलाएं खुले आसमान तले रूखा-सूखा खाकर दिन काट रहे हैं।
जलावन बिके तो जलता है चूल्हा, बासगीत पर्चा हाथ में होने के बाद भी नहीं मिली जमीन
पार्क में तिरपाल के नीचे आठ माह के नाती के साथ बैठी रानी देवी और उनके पति विपिन सिंह बताते हैं कि घर और फसल तबाह होने के बाद अब उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा लकड़ी बेचना है। जिस दिन जलावन बिकता है, उसी दिन घर में चूल्हा जल पाता है।
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रानी देवी के पास बासगीत पर्चा का आवेदन पत्र तो है, लेकिन अंचल से जमीन अब तक नहीं मिल सकी। कंचन देवी और बिन्टुल सिंह ने बताया कि 20 दिन पहले भी वे यहीं पहुंचे थे, तब भोजन व पंडाल मिला था।
इस बार दोबारा बाढ़ आई तो न पंडाल है और न सरकारी राशन। स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बांटे जाने वाले चूड़ा, चीनी और बिस्कुट से ही मासूमों का पेट भर रहा है।
नोडल पदाधिकारी बोले—रिपोर्ट फाइनल होकर विभाग को भेजी गई, अब राहत वितरण संभव नहीं
विस्थापित परिवारों की इस बदहाली के बीच प्रशासनिक रुख अलग है। मुंगेर के बाढ़ राहत नोडल पदाधिकारी कमल कुमार ने बताया कि पूर्व में गंगा का जलस्तर बढ़ने के दौरान सभी प्रभावितों के लिए सामुदायिक किचन का संचालन किया गया था और पॉलीथीन शीट का वितरण हुआ था।
अब गंगा का पानी तेजी से घट रहा है और जिले की बाढ़ राहत रिपोर्ट फाइनल करके संबंधित विभाग को भेजी जा चुकी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थिति में नए सिरे से राहत सामग्री का वितरण या सामुदायिक किचन का संचालन नियमत: संभव नहीं है।
"पूर्व में बाढ़ के दौरान सभी पीड़ितों के लिए सामुदायिक किचन चलाकर भोजन उपलब्ध कराया गया था और पॉलिथीन शीट बांटी गई थी। अब गंगा का पानी घट रहा है और राहत रिपोर्ट फाइनल कर विभाग को भेजी जा चुकी है। इसलिए अब राहत सामग्री वितरण या कम्युनिटी किचन चलाना संभव नहीं है।"
