मनोज मिश्र, तारापुर (मुंगेर) : तारापुर शहीद स्मारक देश के सबसे बड़े गोलीकांड का गवाह बना है। अंग्रेज सिपाहियों की गोलियां स्वतंत्रता सेनानियों ने हंसते-हंसते खाई थी। मैदान में कोई भाग नहीं रहा था। सेनानी स्थानीय थाना भवन पर तिरंगा फहराने में सफल हुए थे।

कब हुई थी गोलीकांड

1932 के फरवरी माह में दोपहर बाद हुए गोलीकांड में 50 से अधिक शहीद हो गये थे। उनकी स्मृति में थाना के सामने शहीद स्मारक भवन का निर्माण हुआ है। आजादी मिलने के बाद से हर साल स्थानीय लोग तारापुर दिवस मनाते आ रहे हैं। इस बार भी इसकी तैयारी जोरों पर है।

कई स्वतंत्रता सेनानियों ने बताया कि जालियावाला बाग से वह घटना बड़ी थी। यहां खुले में सैकड़ों लोग धावक दल को थाना पर झंडा फहराने का जिम्मा दिया था। उनका मनोबल बढ़ाने के लिए खड़े रह भारतमाता की जय, वंदे मातरम्.आदि का जयघोष कर रहे थे। उन पर अंग्रेजों के कलक्टर एवं एसपी के नेतृत्व में गोलियां दागी गयी थी। गोली खा कर भी कोई भाग नहीं रहा था। इस कांड के बाद कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर हर साल देश में 15 फरवरी 1932 को तारापुर दिवस मनाने का निर्णय लिया था। घटना के बाद अंग्रेजों ने शहीदों का शव वाहनों में लाद कर सुलतानगंज की गंगा नदी में फेंकवाया था। इसमें 14 शहीदों की पहचान हुई थी।

पहचाने गए शहीदों में

विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढि़या), रामेश्वर मंडल (पड़भाड़ा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगांव) थे। उस समय बरामद 21 अज्ञात शवों की पहचान नहीं हुई थी।

क्या है इसका इतिहास

सुपौर जमुआ गांव के श्री भवन में तारापुर थाना पर झंडा फहराने की योजना बनी थी। मदनगोपाल सिंह, त्रिपुरारी सिंह, महावीर प्रसाद सिंह, कार्तिक मंडल, परमानंद झा को थाना पर तिरंगा लहराने की जिम्मेवारी दी गयी थी। डीएम ई ओली तथा एसपी डब्ल्यू फ्लैग ने इसे विफल करने के लिए मोर्चा संभाला था। कल उन्हीं शहीदों की याद में शहीद स्मारक पर वरीय स्वतंत्रता सेनानी तिरंगा फहराएंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे तथा स्वतंत्रता सेनानी शहीदों जैसी देशभक्ति का संकल्प लिया जायेगा।

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