10 साल साइकिल की दुकान पर बनाता रहा पंक्चर, अब Indian Railway के लिए काम करेगा मुंगेर का लाल
Munger Sachin Kumar ALP Success Story: मुंगेर के धरहरा निवासी सचिन कुमार ने परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी संभालते हुए साइकिल ...और पढ़ें

Munger Sachin Kumar ALP Success Story: साइकिल की मरम्मत करते सचिन का रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट के पद पर चयन।
HighLights
पिता की बीमारी के कारण संभाली साइकिल की दुकान।
ऑनलाइन पढ़ाई और सेल्फ स्टडी से की रेलवे की तैयारी।
असिस्टेंट लोको पायलट बनकर परिवार को दी नई उम्मीद।
शशिकांत, धरहरा (मुंगेर)। Munger Sachin Kumar ALP Success Story: जिस उम्र में युवा अपने भविष्य के सपनों को आकार देने के लिए बड़े-बड़े संस्थानों और महंगे संसाधनों की तलाश करते हैं, उस उम्र में धरहरा के कुमारपुर निवासी सचिन कुमार के कंधों पर पूरे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी आ गई थी।
पिता की सेहत खराब रहने के कारण घर की मुफलिसी और बढ़ गई, जिसे संभालने के लिए सचिन ने साइकिल की दुकान थाम ली।
दिनभर ग्राहकों की साइकिलों के पंचर बनाना, उनकी मरम्मत करना और ग्राहकों का इंतजार करने के बीच भी उनके मन में रेलवे में नौकरी पाने का एक सपना पल रहा था।
दुकान की कमाई से घर का चूल्हा जलाने और बचे हुए समय में अपनी पढ़ाई जारी रखने के बीच उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। लगभग दस वर्षों के कड़े संघर्ष और अटूट मेहनत के बाद आखिरकार उनकी तपस्या रंग लाई।
अब सचिन ट्रेन के इंजन में बैठकर देश की रेल सेवा में अपना योगदान देंगे। 25 वर्षीय सचिन का चयन रेलवे में असिस्टेंट लोको पायलट (ALP) के पद पर भुवनेश्वर रेलवे जोन में हुआ है। उनके पूरे परिवार और क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है।
दुकान और पढ़ाई के बीच बिठाया बेहतरीन तालमेल
सचिन ने अपनी शुरुआती शिक्षा डीपी यादव उच्च विद्यालय, घटवारी से पूरी की। आर्थिक तंगी इतनी अधिक थी कि किसी बड़े शहर में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग लेना उनके लिए संभव नहीं था।

ऐसी विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी और घर पर रहकर ही ऑनलाइन कक्षाओं व सेल्फ स्टडी के माध्यम से रेलवे भर्ती परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
कभी दुकान पर ग्राहकों की भीड़ को संभालना तो कभी रात के वक्त या फुर्सत के पलों में किताबों से नाता जोड़ना, उनकी दैनिक जीवनशैली बन गई थी।
उन्होंने दुकान के काम और अपनी पढ़ाई के बीच ऐसा बेहतरीन तालमेल बिठाया कि मेहनत में कभी कोई कमी नहीं आने दी।
पिता की बेबसी बनी जिम्मेदारी, सफलता ने दी नई उम्मीद
सचिन के पिता पहले मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे, लेकिन गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वे अब काम करने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
ऐसे में सचिन की यह सफलता सिर्फ एक नौकरी मिलने भर की खुशी नहीं है, बल्कि उनके परिवार के लिए एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य की मजबूत उम्मीद है।

वर्षों तक साइकिल की दुकान पर पसीना बहाने वाले सचिन ने यह साबित कर दिखाया है कि सीमित संसाधन कभी भी किसी के सपनों की सीमा तय नहीं करते।
उनकी यह प्रेरणादायक सफलता उन तमाम युवाओं के लिए एक जीवंत मिसाल है, जो मामूली आर्थिक कठिनाइयों या असुविधाओं के कारण अपने लक्ष्य से पीछे हटने लगते हैं।
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