यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 29, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
ओम नम: शिवाय : वीरेश्वर शिव, भीठ भगवानपुर
मधेपुर प्रखंड के भीठ भगवानपुर में विराजमान हैं वीरेश्वर शिव। गांव के एक छोर पर स्थापित यह शिवालय काफी प्राचीन है। वीरेश्वर शिव की महिमा चहुंओर व्याप्त हैं।

मधेपुर प्रखंड के भीठ भगवानपुर में विराजमान हैं वीरेश्वर शिव। गांव के एक छोर पर स्थापित यह शिवालय काफी प्राचीन है। वीरेश्वर शिव की महिमा चहुंओर व्याप्त हैं। वीरेश्वर शिवालय चौपहल ऊपर की ओर जाता हुआ है। बगल से ही कमला बलान नदी गुजरती है। इतिहास वीरेश्वर शिवालय 600 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना तत्कालीन राजा मल्लदेव के मंत्री वीरेश्वर ने की थी। जहां शिवालय स्थापित है वहां खोदाई में अनेक प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो शिवालय परिसर में स्थापित हैं। इस मंदिर का निर्माण मल्लदेव की लड़ाई में हुई जीत पर मंत्री वीरेश्वर द्वारा किया गया था। इस परिसर में मिट्टी के नीचे आज भी बड़े-बड़े नक्काशीयुक्त शिलाखंड पड़े हुए हैं। गांव से अलग स्थान पर वीरेश्वर शिवालय परिसर के आगे तालाब है। तैयारियां सावन में यहां हजारों की संख्या में कांवरियां तथा शिव भक्त समीप के कमला बलान व कोसी नदी से जल लाकर शिव का जलाभिषेक करते हैं। सावन में स्थानीय लोगों के सहयोग से कांवरियों की सुविधा के लिए ठहरने का इंतजाम करते हैं। जलाभिषेक मे सहयोग के लिए स्थानीय लोगों की टीम बना दी गई है। सावन के मौके पर शिवालय को आकर्षक ढ़ंग से सजाया गया है। संध्या आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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'वीरेश्वर शिवालय सालों भर भक्तों का आना रहता है। यहां शिवभक्त कमला बलान व कोसी की जल से जलाभिषेक करते हैं। सावन में महारुद्राभिषेक का महत्ता और बढ़ जाती है। सावन में जलाभिषेक से शिव अतिप्रसन्न होते हैं।'
- विनय कुमार
फोटो 29 एमडीबी 5
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'विरेश्वर शिवालय आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। समु्द्र मंथन के समय निकले विष का भगवान शिव ने पान कर संसार को विष के ताप से बचाया था। सावन में जलाभिषेक कर भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने की महत्ता है।'
- गुरु शरण सर्राफ
फोटो 29 एमडीबी 6
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(श्रद्धा का महासावन) : भक्तों की सभी पीड़ा दूर करते शिव
फोटो 29 एमडीबी 7 समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव द्वारा विष ग्रहण के कारण उनका गला नीला पड़ गया। विष के ताप को कम करने के लिए पवित्र जलाशयों का जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया गया। श्रावण माह की आध्यात्मिक महत्ता पर चर्चा करते हुए शिवभक्त अरुण राय ने कहा कि सोमवारी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक बाद संध्याकाल में शिव के महाश्रृंगार अनुष्ठान में शामिल होना चाहिए। शिव भक्तों को क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे विष से दूर रहने की जरूरत है। भक्तों को श्रावण जैसे पवित्र माह में भगवान शिव का आशीर्वाद ग्रहण करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। सोमवार को भगवान शिव पर जलाभिषेक से श्रद्धालुओं के मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूरी होती हैं। भक्तों की सभी पीड़ा महादेव दूर करते हैं। सोमवारी पर उपवास का आध्यात्मिक महत्ता रही है। सप्ताह में एक दिन उपवास रखकर अपने इष्ट की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। उपवास से कई प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलता है। शिव भक्तों को मानव सेवा के क्षेत्र में भी आगे आना चाहिए। हरेक लोगों में ईश्वर का वास होता है। जरूरतमदों की सेवा भी मानव धर्म होता है। मानव सेवा ही माधव सेवा होता है। शिव की पूजा-अर्चना के साथ ही लोगों की सेवा को तत्पर रहना चाहिए।
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