बिहार के टैक्सी ड्राइवर के बेटे का कमाल, बिना इंजीनियरिंग किए बनाई पानी साफ कर बिजली देने वाली मशीन
UNDP Innovation Challenge: मधुबनी के पीयूष झा ने 'एनर्जी न्यूट्रल' नामक एक ऐसी मशीन बनाई है जो औद्योगिक रासायनिक पानी ...और पढ़ें

पीयूष झा ईटीपी तकनीक पर लगातार काम कर रहे हैं।
HighLights
पीयूष झा ने 'एनर्जी न्यूट्रल' मशीन बनाई, जो पानी साफ करती है।
यह मशीन औद्योगिक गंदे पानी से बिजली भी पैदा करती है।
UNDP ने पीयूष के इस नवाचार को मान्यता दी और समर्थन किया।
ब्रज मोहन मिश्र, मधुबनी। Water Purifying Machine: कहते हैं जहां चाह है, वहां राह है। मधुबनी जिले के राजनगर प्रखंड के बलहा उत्तरी टोल निवासी पीयूष झा (20 वर्षीय) ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते कर दिखाया है, जिसे बड़ी-बड़ी कंपनियां और लैब सोचते तो हैं, लेकिन धरातल पर उतार नहीं पातीं।
एनर्जी न्यूट्रल पर काम
पीयूष ने औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले केमिकल युक्त गंदे पानी को साफ करने के साथ बिजली बनाने वाली मशीन बनाई है। इस मशीन का नाम है 'एनर्जी न्यूट्रल'।
वर्ष 2020 में उन्होंने इस पर शोध शुरू किया। इसी वर्ष मशीन बनाई। पीयूष की इस उपलब्धि को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने भी मान्यता दी है।

यूएनडीपी ने अपने चार महीने के 'यूथ को: लैब नेशनल इनोवेशन चैलेंज' में पीयूष को न सिर्फ प्रशिक्षण दिया, बल्कि ग्रांट और मेंटरशिप देकर विजेता भी बनाया।
एसटीपी और ईटीपी पर काम
पीयूष एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) और ईटीपी (एफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट) तकनीक पर काम करते हैं। मुख्य रूप से ईटीपी पर, जो इंडस्ट्री से निकलने वाले केमिकल युक्त गंदे पानी को साफ करती है।
एक इंडस्ट्री को इस तकनीक पर सालाना 20 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। बिजली की भी खपत होती है, जबकि पीयूष की बनाई 40 फीट की कंटेनरनुमा एनर्जी न्यूट्रल मशीन में एक हजार से 10 लाख लीटर तक पानी साफ करने की क्षमता है।
एक से दो यूनिट बिजली
इसमें न केमिकल डोजिंग की जरूरत पड़ती है, न ही भारी सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर की। मशीन को चलाने के लिए इंडस्ट्री को सिर्फ एक से दो यूनिट बिजली देने की जरूरत होगी।
उस बिजली को भी मशीन लौटा देती है। बाकी बिजली मशीन खुद गंदे पानी में मौजूद बायोडिग्रेडेबल वेस्ट को माइक्रोऑर्गेनिज्म से तोड़ते हुए पैदा कर लेती है। इससे लागत 60 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

हासिल किया पेटेंट
पीयूष ने इसका पेटेंट भी कराया है। उनका लक्ष्य छोटे और मध्यम उद्योगों तक इस तकनीक को ले जाना है ताकि नदियों तक जहरीला पानी नहीं पहुंचे। पीयूष कहते हैं कि अभी मशीन की कीमत 35 से 40 लाख रुपये है।
इसे चालू करने के लिए बिजली चाहिए, लेकिन उसके बाद यह मशीन खुद ही बिजली बनाती है। इससे इस पर किया गया खर्च शीघ्र निकल जाएगा।
पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान
उनके इस काम को पर्यावरण के क्षेत्र में बड़ा योगदान माना जा रहा है। मर्सिडीज बेंज के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) प्रोग्राम ने उन्हें पर्यावरण पर काम करने का बड़ा मौका दिया। उन पर 1.25 मिनट की डॉक्यूमेंट्री भी बनी है।
छोड़ा इंजीनियरिंग
पीयूष के पास वाटर ट्रीटमेंट में कोई औपचारिक डिग्री नहीं है। गूगल, डीपीआईआईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय, मर्सिडीज बेंज फैलोशिप सहित कई संगठनों ने उनकी मदद की। अभी वह बेंगलुरु में छोटी सी यूनिट चला रहे हैं।
पीयूष का कहना है कि जब वह नौवीं कक्षा में थे, तब उन्होंने अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के साथ पृथ्वी के बाहर पार्टिकल्स पर आधारित एक प्रोजेक्ट पर काम किया।

एसएटी-सीटी में 98 परसेंटाइल लाकर बीटेक में दाखिला लिया था, लेकिन स्टार्टअप पर फोकस करने के लिए कॉलेज छोड़ दिया। अब वे आईआईटी मद्रास से ऑनलाइन डाटा साइंस की पढ़ाई कर रहे हैं।
मुंबई की झुग्गी में बीता बचपन
पीयूष के पिता पप्पू झा टैक्सी चालक हैं। मां घरों में खाना बनाने का काम करती हैं। पीयूष जब दो साल के थे तब रोटी-रोजी की तलाश में माता-पिता उन्हें मधुबनी से लेकर मुंबई चले गए।
परिवार झुग्गी में रहता था। वहां गंदा और दूषित पानी पीकर लोग हैजा, डायरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे थे। गंदा पानी पीने से एक दोस्त की मौत ने उन्हें झकझोर दिया।
उसी समय ठान लिया था कि इस समस्या का किफायती समाधान निकालना है। वर्ष 2020 में मां ने 10 हजार रुपये जुटाकर सेकेंड हैंड लैपटॉप दिलाया। वहीं से रिसर्च शुरू हुई।
