यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 15, 2011 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
डाक वचन : जो कहा एकदम सटीक कहा

मधुबनी। कल्याणी फाउन्डेशन, दरभंगा से प्रकाशित शब्दकोष में डाक शब्द का अर्थ प्राचीन ज्योतिष जिनका वचन लोक मध्य बहुत प्रचलित था- बताया गया है। वस्तुत: लोक रत्न डाक वचन यहां की माटी पानी से जड़े आहार व्यवहार, सुखाड़, बाढ़, पेड़ पौध रोपण, बैल खरीदने, उपचार नुस्खा, वास्तु संबंधी घर तैयारी में मुहुर्त, शकुन, उपनयन, मुंडन, बच्चों के पालन पोषण एवं शिक्षा आदि लोकोक्ति, काव्यमय टिप्पणी आज भी प्रासंगिक है।
जैसे हत्या, लूट, बलात्कार, चोरी इत्यादि की उपज बुद्धि विनाश का उत्प्रेरण न्याय व्यवस्था में माना गया है। डाक वचन में - ई जुनि बूझब डाक निर्बुद्धि, नाशहि काल विनाशे बुद्धि.. इस अपराध तथ्य को दर्शाता है। साथ ही सामान्य जीवन में भी विनाश के समय लोगों का बुद्धि नष्ट होने की स्वभाव इस पंक्ति में है। संपत्ति पर डाक वचन - धन में धान और धन गाय, किछु किछु सोना और सब छाय...। अर्थात धान से चावल, गाय से दूध एवं सोना से पैसा जीवन यापन के लिए यथेष्ट है।
डाक का समय 14 शताब्दी से पूर्व का बताया गया है। जानकारों में यह विवाद है कि डाक कहां के थे। कारण ग्रामीण कवित्त लोकोक्ति की पंक्तियां डाक, घाघ, डंक, भादर इत्यादि रूप में पूरे भारत वर्ष में अनेक प्रांत के कई भाषाओं यथा बंगला विश्वकोश, कनौजिया गोरखपुरिया, राजपुतानियां इत्यादि में भी देखा गया है। मिथिला में किसानों के कंठ से उनके मूल वाणी का प्रस्फुटन अनायास निकल पड़ता है जो उस समय की जरूरत होती है। डाक का मंगल गान में- गिरिजा गिरा गोविन्द गणेश, सकल काज सुमरि गिरिजेश.. पंक्ति में पांच गकार से कार्य प्रारंभ में बिघ्न नहीं होने की बात है। मुंडन संस्कार में- चैत छारि शुभ वासर मानि, जन्म मास में कीजिए त्यागि..। जबकि पढ़ने के समय प्रारंभ के लिए खल्ली संस्कार पर उक्ति है कि - पांचम वर्ष में खल्ली आनि, पूजे कर शिशु अक्षर कामा..। सामान्य जीवन पर उनकी टिप्पणी - शनि रवि फटकी, मंगल टाट, ई तीनो ताके स्वर्गग वाट ...। वैसे ही कपटी मित्र कोसलिया माय बुरबक बेटा, टेटा जमाय, कहहि डाक चारो परिहारि..।
बैल खरीदने के लिए नाटा बरद, बहुरिया जोय, नहि घर बसै न खेती होई.। खेती पर आनक संगे करि न चास, न हो अन्न न गामे बास..। धर्म पर उनकी टिप्पणी बतहा के चौदह, बतहीक आठ अर्थात बतहा शिवरात्रि चतुदर्शी व्रत एवं बतही जगदंबा के अष्टमी व्रत करने पर है। सुता उठा पाजर मोड़ा ताहि बीच जनमल छोरा .। यहां हरि शयन एकादशी सुता देवोत्थान उठा एवं जन्माष्टमी भगवान जन्म व्रत की चर्चा है।
छींक पर उनकी उक्ति पूरब छींका मृत्यु हकार, अग्नि कोण में दुखद भार। जबकि कौआ बोली पर - काक द्वार में आवे जाय, कहथि डाक जे पाहुन पाय। यात्रा पर उनकी उक्ति सोमे शुक्रे बुधे उखा छारह पंडित लेखा जोखा.. तात्पर्य सोम शुक्र बुध के उषा काल में यात्रा में कोई दोष नहीं है। केला रोपने के लिए - भादो भदवा सिमी बारि केला रोपी दिन विचार..। अर्थात यहां सीमी एकादशी, द्वादशी एवं अष्टमी नवमी से है। इस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र में डाक वचन आज भी प्रासंगिक हैं। पूर्व प्राचार्य डा.जगदीश मिश्र ने बताया कि डाक वचन में प्रत्येक वस्तु पर सूक्ष्म नजर दर्शाया गया है जबकि हिन्दी के प्राध्यापक डा.सदन मिश्र ने बताया कि डाक वचन में सामयिकता की नजर पूर्णत: दिखाई देता है।
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