यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 02, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सावन विशेष: यहां पूरी होती हर मनोकामनाएं

कलुआही प्रखंड के पुरसौलिया में प्राचीन काल से ही पंचमुख शिव विराजते हैं। जहा सावन में कमला नदी से जलाभिषेक करने पर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है।
प्राचीन है इतिहास :
राजा विराट के द्वारा पूजित इस पंचमुखी महादेव स्थान से कभी कमला उत्तर वाहिनी होकर आगे बहती थी। जिसके दक्षिणी तट पर अवस्थित पंचमुख स्वयं तो कमला के पंक का आवरण लेकर भूमिस्थ हो गए लेकिन उस स्थान पर प्रत्येक वर्ष नरक निर्वारण चतुर्दशी को मेला लगता रहा। उस स्थल पर कुआं खुदाई के दौरान पंचमुख पुन: प्रकट हुए। तब से पिछले सदी के साठ के दशक तक उसी कूप में वे पुजित होते रहे।
लेते थे जलसमाधि :
एक फूट से अधिक लम्बाई की यह पंचमुख शिवलिंग उस कूप में सदियों तक रहे जहा वे प्रत्येक वर्ष आषाढ़ से पौष मास तक कमला के जल और पंक में विलीन होकर माघ मास के नरक निर्वारण चतुर्दशी को प्रकट एवं पूजित होकर बैसाख तक भक्तों के दर्शन के लिए सुलभ रहते थे।
मंदिर निर्माण :
साठ के दशक में जब भयंकर अकाल पड़ा था, उस समय कैथाही (राजनगर) के संत राम रसीक दास ने अपने हठ योग के बल पर इन्हें उस कूप से निकाल कर कुछ दूरी पर भव्य मंदिर निर्माण कराकर अक्षय तृतीया को स्थापित किया। बैसाख मास में उत्तर वाहिनी कमला में बाढ़ आ गई। जिसके जल से ही पंचमुख का वेदोक्त पद्धति से जलाभिषेक किया गया। इसके बाद उस पुराने कमला के बहाव मार्ग में इतनी जलराशि नहीं देखी गई।
अर्ध भग पर थे :
कूप से बाहर निकाले जाने के समय पंचमुखी शिवलिंग के नीचे अर्ध भग भी निकला था। जिसके ऊपर जलधरी में वे विराजमान थे। साबुत अवस्था में मिले उस नक्काशीदार अर्ध भग को मंदिर के सामने एक पेड़ के नीचे रखा गया है। गौरतलब है कि करीब तीन किमी पश्चिम-दक्षिण, विराट पूजित राढ़ के अष्ठकोणीय विराटेश्वर शिवलिंग जलढरी की जगह चौकोर द्विस्तरीय पादपीठ पर अवस्थित है। जो यज्ञ कुंड जैसा दिखता है और यहा पंचमुख अर्ध भग के साथ।
सालों भर रहती भीड़
माघ, बैसाख और सावन मास के अलावे प्रत्येक सोमवार को यहां दिन भर भक्तों की भीड़ रहती है। लेकिन रात में यहां किसी को ठहरने का साहस नहीं पड़ता है। कहते हैं रात के समय ठहरने वालों को ऐसा अनुभव होता है कि यहां रात को सुक्ष्म लोक के वासी श्मशानी बाबा पंचमुखी का पुजन करते हैं।
कैसे पहुंचे :
कलुआही-जयनगर एनएच 105 के बरदेपुर गणेश चौक से होकर ग्रामीण सड़क जो कलुआही-बासोपंट्टी वाली सड़क में मलमल राढ़ में मिलती है। इसी मार्ग में दोनों सड़क से समान दूरी दो किमी पर अवस्थित पंचमुख स्थान तक पैदल अथवा रिक्शा से जाया जाता है।
प्रस्तुति: कपिल झा, कलुआही, मधुबनी