संवाद सूत्र, सिंहेश्वर (मधेपुरा) : योग किसी जाति, धर्म या देश मात्र की संपत्ति नहीं है। यह संपूर्ण मानवता की धरोहर है। इसकी महत्ता प्राचीन काल से आज तक निर्विवाद रूप से बरकरार है। उक्त बातें दर्शनशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के पूर्व अध्यक्ष सह अखिल भारतीय दर्शन परिषद के अध्यक्ष प्रो. (डा.) जटाशंकर ने कही। वह रविवार को दर्शनशास्त्र विभाग, भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के तत्वावधान में मानवता के लिए योग विषय पर आयोजित संवाद में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। यह कार्यक्रम शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत संचालित भारतीय दार्शिनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित स्टडी सर्किल योजना के तहत आयोजित किया गया।

उन्होंने कहा कि योग के आठ अंग या साधन हैं। इनमें यम, नियम, आसन, प्रणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व समाधि शामिल है। इन आठों का महत्व है। केवल आसन व प्राणायाम या ध्यान अथवा किसी भी अन्य साधन को ही योग मानना उचित नहीं है। योग-मार्ग में सही मायने सफलता पाने के लिए आठो अंगों का क्रमश: पालन करना आवश्यक है।

इससे पहले अतिथियों का अंगवस्त्र से स्वागत किया गया। स्वागत भाषण विभागाध्यक्ष शोभाकांत कुमार व विषय प्रवेश दर्शन परिषद, बिहार की अध्यक्षा प्रो. (डा.) पूनम सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन दर्शनशास्त्र विभाग, बीएनएमयू, मधेपुरा में असिस्टेंट प्रो. डा. सुधांशु शेखर व धन्यवाद ज्ञापन पूर्व कुलपति डा. ज्ञानंजय द्विवेदी ने किया। प्रांगण रंगमंच की स्वाति आनंद एवं आदित्य आनंद ने देवी वंदना व स्वागत गीत प्रस्तुत किया। राष्ट्रगान जन-गन-मन के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम के आयोजन में प्रांगण रंगमंच के अध्यक्ष डा. संजय परमार व दिलखुश, शोधार्थी द्वय सारंग तनय व सौरभ कुमार चौहान, गौरव कुमार सिंह, डेविड यादव, प्रणव कुमार प्रियदर्शी आदि ने सहयोग किया। इस अवसर पर कैलाश परिहार, अभिषेक कुमार, प्रिस यादव, डा. कमल किशोर, सोना राज, डा. सुनील सिंह, अंशु कुमार सिंह, डा. अरुण कुमार सिंह, शिवा पांडे, अवधेश प्रताप, अरुण कुमार, आरती झा, अशोक कुमार, छोटू कुमार, जूही कुमारी, नीरज कुमार, निधि मिश्रा, नीतू कुमारी, पल्लवी राय, राज कुमार नीतू कुमारी, लल्लू कुमार, गौतम, दीपा भारती, माधव कुमार, चंदन कुमार, प्रवीण कुमार, प्रवीण कुमार, सुशील कुमार, रागिनी सिन्हा, नयन रंजन आदि उपस्थित थे। जीवन में योगाभ्यास को अपनाने की जरूरत इस अवसर पर मुख्य वक्ता दर्शनशास्त्र विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना (बिहार) के प्रो. (डा.) एनपी तिवारी ने कहा आज हमने आधुनिक जीवनशैली को अपना लिया है। इसके कारण आज हमारा तन-मन स्थिर नहीं है। अत: हमें जीवन में योगाभ्यास को अपनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि योग केवल व्यायाम या प्राणायाम नहीं है।इसका व्यापक अर्थ है। योग हमें सभी मनुष्यों तथा प्रकृति-पर्यावरण से जोड़ता है। योग व आध्यात्म से था भारत का वैभव पूर्व सांसद व पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. (डा.) रामजी सिंह ने कहा कि योग कहा कि प्राचीन काल से योग व आध्यात्म के कारण ही भारत का वैभव था और दुनिया के लोग भारत को विश्वगुरू मानते थे। लेकिन कालांतर में कुछ कारणों से हमारा यह वैभव कम हो गया। यदि हम पुन: योग व आध्यात्म के सैद्धांतिक रूप को व्यवहारिक धरातल पर उतारने का प्रयास करें, तो हम पुन: विश्वगुरू बन सकते हैं। अत: हमें योग को व्यक्तिगत, सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन का अनिवार्य अंग बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि योग सिर्फ बूढ़े व बीमार लोगों के लिए नहीं है, बल्कि यह सबों के लिए है। अत: योग को मानव दिनचर्या का हिस्सा बनाने की जरूरत है। साथ ही अविलंब प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक के सभी पाठ्यक्रमों में योग को अनिवार्य पत्र के रूप में शामिल करना है। वैश्विक स्तर पर बढ़ी है योग की महत्ता कार्यक्रम की अध्यक्षता आइसीपीआर, नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष प्रो. (डा.) रमेशचंद्र सिन्हा ने कहा कि भारत सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से वर्ष 2015 से वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की शुरूआत हुई है। इस दिवस के लिए इस वर्ष का मुख्य विषय मानवता के लिए योग रखा गया है। यह वैश्विक स्तर पर योग की बढ़ती महत्ता व स्वीकार्यता का प्रमाण है। आयोजन सचिव डा शेखर ने बताया कि स्टडी सर्किल के अंतर्गत कुल बारह कार्यक्रम होना है। पहला आयोजन तीस अप्रैल को सांस्कृतिक स्वराज विषय पर, दूसरा आयोजन तीस मई को गीता-दर्शन पर और तीसरा 26 जून को मानवता के लिए योग विषय पर संपन्न हुआ। आगे क्रमश: जुलाई 2022 से लेकर मार्च 2023 तक आठ कार्यक्रम होना है।

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