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150 साल पुरानी परंपरा: लखीसराय के बड़ी देवी मंदिर में मुस्लिम परिवार की शहनाई से सजता है भक्ति का माहौल

Published: Sun, 11 Oct 2026 05:58 PM (GMT+05:30)

लखीसराय के बड़ी दुर्गा महारानी मंदिर में 150 साल से सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी परंपरा कायम है, जहां नवरात्र में ...और पढ़ें

शहर के बड़ी दुर्गा मंदिर में नगाड़ा और शहनाई बजा रहे मु. सलमान और मु. नसीम। (जागरण)

शहर के बड़ी दुर्गा मंदिर में नगाड़ा और शहनाई बजा रहे मु. सलमान और मु. नसीम। (जागरण)

HighLights

  1. लखीसराय दुर्गा मंदिर में 150 साल से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल।

  2. मुस्लिम परिवार तीन पीढ़ियों से नवरात्र में शहनाई-नगाड़ा बजाता है।

  3. यह परंपरा आस्था और इंसानियत के संगम का संदेश देती है।

मुकेश कुमार, लखीसराय। शहर के नया बाजार दालपट्टी स्थित बड़ी दुर्गा महारानी मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की जीवंत मिसाल भी है।

करीब डेढ़ सौ साल पुरानी परंपरा में पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन एकता के सुर आज भी बरकरार हैं। नवरात्र में बड़ी देवी के आगमन से लेकर विसर्जन तक मुस्लिम समुदाय के लोग शहनाई और नगाड़ा बजाकर माता के स्वागत में अपनी भागीदारी निभाते हैं।

खगौर गांव के एक मुस्लिम परिवार की तीन पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। यहां आस्था के साथ सुरों का संगम मजहबी दीवारों से ऊपर उठकर इंसानियत और आपसी सद्भाव का संदेश देता है।

मंदिर में महिलाओं की सिंदूर होली और बेल भरनी के दिन बड़ी व छोटी देवी के मिलन की परंपरा भी आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि दोनों देवियों के मिलन से पहले शहर की अन्य प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं होता।

इस दौरान हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। बड़ी दुर्गा मंदिर की परंपराएं बताती हैं कि त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने और आपसी अपनापन बढ़ाने का अवसर भी हैं।

तीन पीढ़ियों से मुस्लिम परिवार बजा रहा शहनाई और नगाड़ा

जिले की खगौर पंचायत के खगौर गांव निवासी मु. अकबाली का परिवार तीन पीढ़ियों से बड़ी दुर्गा मंदिर में शहनाई और नगाड़ा बजाता आ रहा है।

मु. अकबाली के निधन के बाद उनके पुत्र मु. जमाल ने परिवार के सदस्य मु. हैदर के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ाया। करीब आठ वर्ष पहले मु. जमाल का निधन हो गया।

इसके बाद तीसरी पीढ़ी के रूप में उनके पुत्र मु. नसीम और मु. हैदर के पुत्र मु. सलमान इस विरासत को संभाल रहे हैं। मु. नसीम और मु. सलमान बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने कोलकाता में शहनाई और नगाड़ा वादन सीखा था। इसके बाद से ही परिवार बड़ी दुर्गा मंदिर में वादन की परंपरा निभाता आ रहा है।

मंदिर में सेवा देने के साथ परिवार के सदस्य शादी-विवाह समारोहों में भी शहनाई और नगाड़ा बजाते हैं। इसी कला से परिवार की आजीविका चलती है। उनके लिए यह केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से मिली विरासत और आपसी सौहार्द का प्रतीक भी है।

1893 में हुई थी मंदिर की स्थापना, 108 फीट ऊंचा है भवन

शहर के हृदयस्थल नया बाजार दालपट्टी में स्थित बड़ी दुर्गा महारानी मंदिर का इतिहास करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। श्री संयुक्त समिति बड़ी दुर्गा पूजा समिति की देखरेख में यहां नवरात्र और दुर्गा पूजा का आयोजन होता है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1893 में एक देवीभक्त ने मंदिर की स्थापना की थी। वर्ष 2000 में पूजा समिति की देखरेख में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।

वर्तमान में मंदिर की ऊंचाई 108 फीट बताई जाती है। रात में दूधिया रोशनी से जगमगाता मंदिर दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करता है।

मंदिर के ऊपरी तल पर बने गर्भगृह में नवदुर्गा विराजमान हैं, जहां प्रतिदिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। शहर में बड़ी देवी के नाम से विख्यात यह मंदिर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सौहार्द की परंपरा को भी संजोए हुए है।

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