दुर्गापूजा में दस दिनों तक घर-घर पहुंचता है दशाय नृत्य, किशनगंज में संथाल समुदाय ने सहेजी सदियों पुरानी परंपरा
संथाल समुदाय किशनगंज के ठाकुरगंज में दुर्गा पूजा के दौरान दस दिनों तक पारंपरिक दशाय नृत्य प्रस्तुत करता है। यह ...और पढ़ें

घर-घर पहुंचता है दशाय नृत्य
HighLights
दुर्गा पूजा में दस दिवसीय दशाय नृत्य की प्रस्तुति।
संथाल समुदाय अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को सहेज रहा है।
पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत और वाद्ययंत्रों का प्रयोग।
बीरबल महतो, ठाकुरगंज (किशनगंज)। दुर्गा पूजा आस्था और आराधना का पर्व है, लेकिन ठाकुरगंज के संथाल समुदाय के लिए यह अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का अवसर भी है। यहां दुर्गा पूजा के पहले दिन से विजयादशमी तक संथाल समुदाय के लोग घर-घर और द्वार-द्वार पहुंचकर पारंपरिक दशाय नृत्य प्रस्तुत करते हैं।
दस दिनों तक चलने वाली यह परंपरा लोकगीतों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और सामूहिक भागीदारी के माध्यम से संथाल समाज की सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही है। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा के दरबार में माथा टेकने के साथ इस परंपरा का समापन होता है।
मोरपंख की पगड़ी और घुंघरुओं की थाप पर थिरकते हैं कलाकार
दशाय नृत्य की सबसे खास पहचान कलाकारों की पारंपरिक वेशभूषा और लोकगीत हैं। पुरुष कलाकार मोरपंख से सजी पगड़ी, पारंपरिक धोती और घुंघरू पहनकर नृत्य करते हैं। लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर प्रस्तुत यह नृत्य संथाल समाज की समृद्ध लोकसंस्कृति की झलक पेश करता है।
कलाकारों की टोली जब गांव की गलियों और घरों के द्वार पर पहुंचती है, तो वातावरण पारंपरिक गीत-संगीत से गूंज उठता है। बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के दौर में पारंपरिक लोककलाओं को सहेजना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
इसके बावजूद ठाकुरगंज प्रखंड के माटीकुरा, कच्चुदह, निमोभिट्ठा, मालाकाटा, ओल्ड मेची और योगीटोला पथरिया सहित विभिन्न गांवों में संथाल समुदाय के लोग इस परंपरा को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।
लोककथाओं में छिपी है गुरु-भक्ति और एकजुटता की कहानी
माटीकुरा गांव के सुनील हेंब्रम और मांझी टुडू बताते हैं कि दशाय नृत्य केवल उत्सव और मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संथाल समुदाय की ऐतिहासिक स्मृतियों, लोकमान्यताओं और सामुदायिक मूल्यों से भी जुड़ा है।
संथाल समाज में प्रचलित एक लोककथा के अनुसार, प्राचीन काल में जब समाज के कुछ गुरु या महापुरुष लापता हो गए थे और उनका पता नहीं चल रहा था, तब उन्हें खोजने के लिए लोग भेष बदलकर समूहों में निकले थे। समुदाय की लोकपरंपरा में इस प्रसंग को दशाय नृत्य से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, यह मान्यता लोककथाओं पर आधारित है।
आज भी दशाय नृत्य के माध्यम से संथाल समुदाय के लोग गुरु के प्रति श्रद्धा, आपसी एकजुटता और संकट के समय एक-दूसरे का साथ देने की भावना को याद करते हैं। यह परंपरा उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों और सामुदायिक मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम बनी हुई है।
सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल
संथाल समुदाय के सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश हेंब्रम, डोमन टुडू, राजेश किस्कू, सूरजा मुर्मू और चंद्रशेखर बेसरा बताते हैं कि दशाय नृत्य समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दुर्गा पूजा के दौरान दस दिनों तक चलने वाली इस परंपरा का उद्देश्य केवल पारंपरिक नृत्य को जारी रखना नहीं, बल्कि लोकगीतों, वाद्ययंत्रों और पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक विरासत को भी सुरक्षित रखना है। ऐसे आयोजनों में सामूहिक भागीदारी से नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को समझने का अवसर मिलता है।
संथाल समुदाय के लोगों का यह सामूहिक प्रयास लोकसंस्कृति के संरक्षण के साथ सामाजिक एकजुटता को भी मजबूत कर रहा है। आधुनिकता के बीच दशाय नृत्य की निरंतरता परंपराओं को जीवित रखने के लिए करने की लोगों ने प्रशंसा की है।
