खगड़िया । हिमोफिलिया एक गंभीर बीमारी है। इसके मरीज को अगर कहीं कोई खरोंच भी लग जाए तो उससे खून बहना बंद नहीं होता है। खगड़िया में इसके पांच मरीज हैं। उनमें एक बच्चा भी शामिल है। खगड़िया में इसकी सूई की व्यवस्था नहीं रहने से इन मरीजों को इसकी निर्धारित सूई लेने के लिए जोखिम मोल लेकर पटना जाना पड़ता है। खगड़िया वार्ड नंबर 24 के एक दिव्यांग शिक्षक आभास रंजन हिमोफिलिया से पीड़ित हैं। वे कहते हैं- जब भी साधारण खरोंच लग जाता है- तो खून निकलना शुरू हो जाता है। सदर अस्पताल में इसकी दवा नहीं है। पटना जाना पड़ता है। नगर सभापति सीता कुमारी ने सूई की व्यवस्था को लेकर सिविल सर्जन को पत्र लिखा है। सिविल सर्जन ने कहा कि इस संबंध में उच्चाधिकारियों को लिखा गया है। दवा की मांग की गई है।

सांसत में रहती है हिमोफिलिया के मरीजों की जान

खगड़िया में इससे संबंधित सूई नहीं रहने से हिमोफिलिया के मरीजों को जान पर बन आई है। उन्हें अपनी जान बचाने के लिए दो सौ किलोमीटर दूर पटना जाना पड़ता है। कोरोना की दूसरी लहर में 10 मई 2021 को स्वास्थ्य विभाग द्वारा राज्य के सभी सिविल सर्जन को पत्र जारी कर थैलेसीमिया के मरीजों के लिए पर्याप्त ब्लड और हिमोफिलिया के मरीजों के लिए एंटी हिमोफिलिया फैक्टर आठ और नौ को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रखने को कहा गया था। इस असाध्य रोग से पीड़ित शहर के बलुआही स्थित वार्ड संख्या- 24 के मरीज आभास रंजन द्वारा 30 जून 2021 को सिविल सर्जन अजय कुमार सिंह को पत्र लिखकर फेक्टर आठ और नौ उपलब्ध कराने की मांग की गई। बावजूद इसके अभी तक अस्पताल में इस असाध्य रोग के इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है। जिसके बाद आभास रंजन ने नगर सभापति सीता कुमारी को पत्र लिखकर स्वास्थ्य विभाग द्वारा हिमोफिलिया के मरीजों के उपचार के लिए इस रोग की एंटी हिमोफिलिया फैक्टर मंगाने की मांग की है। क्या कहते हैं चिकित्सक

सदर अस्पताल के डा. नरेंद्र कुमार ने बताया कि हिमोफिलिया हजारों में एक को होता है। यह रक्त स्त्राव की जगह थक्का बनाने में भी सहायक होता है। जिसको क्लाटिग फैक्टर कहा जाता है। मुख्य रूप से हिमोफिलिया में तीन फैक्टर की बीमारियां होती है- ए, बी और सी। हिमोफिलिया ए सबसे अधिक होता है। जिसमें फैक्टर आठ की कमी के कारण बीमार व्यक्ति का रक्त स्त्राव होना बंद नहीं होता है। उसके बाद फैक्टर नौ जो हजारों में एक व्यक्ति को होता है। हिमोफिलिया सी जिसमें फैक्टर 11 की कमी हो जाती है। इससे भी खून बहना बंद नहीं होता है। डा. नरेंद्र बताते हैं कि शरीर के बहते रक्त स्त्राव को रोकने के लिए शरीर में एक चक्र काम करता है। जैसे ही कहीं चोट लगती है और खून बहना शुरू होता है, यह चक्र काम करना शुरू कर देता है। इस चक्र में कई फैक्टर काम करते हैं। किसी एक फैक्टर के कमी हो जाने के कारण रक्त स्त्राव रुकना बंद नहीं होता है। जब तक की उस फैक्टर की दो उसे नहीं दी जाए। उन्होंने कहा कि यह रक्त स्त्राव शरीर के किसी भी अंग से शुरू हो जाता है। सिर्फ पुरुषों में ही दिखते हैं लक्षण हिमोफिलिया रोग के लक्षण केवल पुरुषों में ही प्रतीत होते हैं। हिमोफिलिया से पीड़ित बच्चों में लक्षण बचपन से दिखने लगते हैं। ऐसे बच्चों को चोट लगने या स्वत: जोड़ों में रक्त स्त्राव की वजह से दर्द या सूजन आ जाता है। इससे घुटने, कलाई, टखने के जोड़ प्रभावित होते हैं। कई बार पेट या ब्रेन में ब्लीडिग होने से जान का खतरा भी हो जाता है। हिमोफिलिया का उपचार डा. नरेंद्र कुमार बताते हैं कि हिमोफिलिया का सही इलाज है। रोगी को नियमित रूप से फैक्टर देते रहना है। इससे रक्त स्त्राव होने ही न पाए व मरीज के शरीर के जोड़ ठीक रहे। वह अपनी सामान्य जिदगी जी सकें।

जिले में हिमोफिलिया के हैं पांच मरीज जिले में हिमोफिलिया के पांच मरीज हैं। जिन्हें रक्त स्त्राव रोकने वाली चक्र में फैक्टरों के कमी से आए दिन जान का खतरा बना रहता है। इसमें नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड संख्या 24 के आभास रंजन और उनकी बहन का लड़का विवेक कुमार सहित महेशखूंट थाना क्षेत्र के चैधा बन्नी के भूपेंद्र कुमार, सन्हौली के सौरभ कुमार और एक मरीज मथार दियारा के हैं। पीड़ित आभास रंजन के भाई सुभाष रंजन ने बताया कि यह असाध्य रोग है। जिसका उपचार पटना में होता है। स्वास्थ्य समिति की ओर से पत्र देने के बावजूद सिविल सर्जन द्वारा इसकी दवाई की डिमांड नहीं की गई। जिससे पीड़ित व्यक्तियों को पटना जाकर इसके फैक्टर की सूई लेनी पड़ती है। अगर यह सूई जिले में उपलब्ध हो जाए तो परेशानी नहीं होगी। उन्होंने बताया कि पटना के तारामंडल के समीप न्यू गार्डनल रोड हास्पिटल के कैंपस में हिमोफिलिया हास्पिटल है। जहां जाकर इसका सूई दिलानी पड़ती है।

कोट

सूई को लेकर स्वस्थ विभाग से मांग की गई है। लेकिन अभी तक अस्पताल को मिला नहीं है।

डा. अजय कुमार सिंह, सिविल सर्जन, खगड़िया।

Edited By: Jagran