31 साल बाद अब्दुल बनकर लौटा 9 साल का बिछड़ा बेटा पिंंटू; मां ने टांके के निशान से पहचाना, पिता बोले- बहू को अपनाएंगे
बिहार के कटिहार के काटाकोश गांव में 31 साल पहले ट्रेन में छूटा पिंटू कुमार यादव अब अब्दुल जब्बार बनकर ...और पढ़ें

ट्रेन छूटने से भटके 9 साल के पिंटू बने अब्दुल जब्बार; 31 साल बाद कटे के निशान से मां ने पहचाना
HighLights
31 साल बाद ट्रेन में छूटा बेटा अब्दुल जब्बार बनकर लौटा।
मां ने बचपन के सिर पर लगे टांके के निशान से पहचाना।
परिवार ने धर्म से ऊपर उठकर बहू-बच्चों सहित अपनाया।
डिजिटल डेस्क, भागलपुर। वक्त का पहिया जब घूमता है तो तीन दशक की लंबी जुदाई, आंसुओं का सैलाब और अनहोनी की आशंकाएं एक पल में ईश्वरीय चमत्कार में बदल जाती हैं। कटिहार जिले के मनिहारी प्रखंड अंतर्गत काटाकोश गांव में एक ऐसा अविश्वसनीय और दिल को छू लेने वाला वाकया सामने आया है, जिसे सुनकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।
करीब 31 साल पहले महज 9 से 10 वर्ष की अबोध उम्र में ट्रेन में छूटकर लापता हुआ बालक पिंटू कुमार यादव जब 41 वर्ष की उम्र में अपनी चौखट पर 'अब्दुल जब्बार' बनकर लौटा, तो पूरे गांव में सन्नाटा खिंच गया। शुरुआत में मां-बाप पहचान नहीं सके, लेकिन जैसे ही मां ने उसके सिर पर बचपन में दुर्घटना के बाद लगे पुराने टांके और शरीर के गहरे निशानों को टटोला, ममता का बांध टूट पड़ा और मां-बेटे फफक-फफक कर रो पड़े।
ट्रेन की सवारी ने छीन लिया था बचपन, कालियागंज में मिला सहारा
काटाकोश निवासी मोतीलाल यादव का बेटा पिंटू करीब 31 साल पहले अपने दो-तीन हमउम्र बच्चों के साथ खेलते-खेलते गांव के पास रुकी ट्रेन पर चढ़ गया था। साथी बच्चे तो प्लेटफॉर्म पर उतर गए, लेकिन छोटा पिंटू उतर नहीं पाया और ट्रेन खुल गई। अनजान स्टेशन पर भटकते और रोते हुए पिंटू पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के कालियागंज पहुंच गया।
पिंटू उर्फ अब्दुल जब्बार ने बताया कि उस वक्त भाषा अलग थी और वह रास्ता भटक चुका था। वहां एक दयालु शख्स (जिन्हें वह मामा कहकर पुकारने लगा) ने इस बेसहारा बच्चे को रोते देखा तो अपने घर डालिमगांव (हरिकृष्णपुर) ले आए। उन्होंने ही उसे खाना-पीना दिया, पाला-पोसा और उसका नाम अब्दुल जब्बार रखा। जब वह 12-13 साल का हुआ तो काम सीखने के लिए दिल्ली भेज दिया गया, जहां उसने कारखानों में झाड़ू-पोछा और मजदूरी कर अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाया।

31 साल पुरानी भौगोलिक यादों और टांके के निशान ने मिटाया संशय
पिंटू के अनुसार, वह अपने मां-बाप और गांव को कभी भूल नहीं पाया था। उसने पहले भी तलाश की कोशिश की थी, लेकिन बचपन की धुंधली यादें आड़े आ रही थीं। हाल ही में पुरानी यादों के सहारे जब वह मनिहारी के काटाकोश पहुंचा, तो गांव का भूगोल पूरी तरह बदल चुका था।
गांव के प्रबुद्ध ग्रामीणों ने जब उससे बात की, तो उसने बताया कि कैसे तीन दशक पहले गांव में गंगा का कटाव नहीं हुआ था और गांव की बसावट कैसी थी। यह वही भौगोलिक स्थिति थी जो 30 साल पहले थी और जिसे आज की पीढ़ी नहीं जानती। इसके बाद पिता मोतीलाल यादव और भाइयों से उसका चेहरा मिलाया गया। रही-सही कसर मां ने पूरी कर दी—बचपन में पिंटू के सिर पर एक हादसे में गंभीर चोट लगी थी, जिसके टांकों का पक्का निशान उसके सिर पर आज भी मौजूद था। निशानों की तस्दीक होते ही परिजनों ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
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'धर्म से बड़ी है इंसानियत'
जब पिंटू के मुस्लिम धर्म अपनाकर अब्दुल जब्बार बनने और वहीं निकाह करने की बात सामने आई, तो परिवार और ग्रामीणों ने इंसानियत की सबसे खूबसूरत मिसाल पेश की। ग्रामीणों ने दो-टूक कहा कि जब इस बच्चे को कोई पूछने वाला नहीं था और यह पूरी तरह बेसहारा था, तब जिस परिवार ने इसे सहारा देकर जिंदगी दी, उस अहसान को धर्म की संकीर्ण दीवारों में नहीं बांधा जा सकता। मानवता और आस्था निजी विषय हैं।
वहीं, पिता मोतीलाल यादव ने भावुक होते हुए कहा, "लड़का हमारा है। जब वह बेसहारा था तब उसे किसी ने जिंदगी दी। उसने वहां निकाह किया है तो क्या हुआ, वह अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर यहां आए, हम अपनी बहू और बच्चों को पूरे हक और प्यार से अपनाएंगे।" 31 साल बाद हुए इस पुनर्मिलन की दास्तान अब समूचे इलाके में कौतूहल और चर्चा का विषय बनी हुई है।
