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विलुप्त होती लोक कलाओं को धार्मिक आयोजनों का सहारा, कटिहार में रासलीला और विषहरी गान से कलाकारों को मिल रहा मंच व रोजगार

Published: Sat, 10 Oct 2026 01:22 PM (GMT+05:30)

डिजिटल युग में विलुप्त होती पारंपरिक लोक कलाओं को कटिहार के प्राणपुर प्रखंड में धार्मिक आयोजनों से नई संजीवनी मिल ...और पढ़ें

धार्मिक पौराणिक प्रसंगों पर रासलीला और नाटक का मंचन करते स्थानीय लोक कलाकार

धार्मिक पौराणिक प्रसंगों पर रासलीला और नाटक का मंचन करते स्थानीय लोक कलाकार

HighLights

  1. कटिहार में धार्मिक आयोजनों से लोक कलाओं को संजीवनी।

  2. रासलीला, विषहरी गान से ग्रामीण संस्कृति का संरक्षण।

  3. स्थानीय कलाकारों को बिहार-झारखंड-बंगाल में अवसर।

संवाद सूत्र, रोशना (कटिहार)। बदलते आधुनिक परिवेश और डिजिटल मनोरंजन के दौर में जहां सामाजिक व धार्मिक नाट्य मंचन से जुड़ी पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थीं, वहीं कटिहार जिले के प्राणपुर प्रखंड में धार्मिक आयोजन इन्हें नई संजीवनी दे रहे हैं।

दुर्गा पूजा, विषहरी गान, रासलीला और अखंड हरिनाम संकीर्तन जैसे वार्षिक आयोजन न केवल ग्रामीण संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं को सहेजने का काम कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय कलाकारों को रोजगार और आजीविका का मजबूत आधार भी प्रदान कर रहे हैं।

  • कटिहार जिले के प्राणपुर प्रखंड अंतर्गत रोशना क्षेत्र में दुर्गा पूजा और धार्मिक आयोजनों से पारंपरिक लोक कलाओं को मिल रही नई संजीवनी

  • रासलीला, विषहरी गान, अखंड हरिनाम संकीर्तन और पौराणिक नाटकों के मंचन से ग्रामीण संस्कृति व विरासत का हो रहा संरक्षण

  • कलाकारों को बिहार ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल और झारखंड से भी मिल रहे मंचन के बुलावे व रोजगार के अवसर

  • नारायण साह, यशवंत साह और सुफल सोरेन समेत स्थानीय कलाकारों ने कहा—नियमित रियाज से मिलती है मंच पर भाव-भंगिमा की जीवंतता

प्राणपुर प्रखंड के रोशना और आसपास के विभिन्न गांवों में दुर्गा पूजा के अवसर पर आयोजित संकीर्तन व नाटकों में भजन गायन और रासलीला करने वाली मंडलियों की मांग इन दिनों काफी बढ़ गई है।

पौराणिक कथाओं और शिव-कृष्ण लीला की सजीव प्रस्तुति; दर्शकों में भारी उत्साह

दुर्गा मंदिरों, विषहरी पूजा पंडालों और महायज्ञों के प्रांगण में रासलीला तथा अखंड हरिनाम संकीर्तन की प्रस्तुतियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं। इन प्रस्तुतियों में स्थानीय ग्रामीण कलाकार अलग-अलग पौराणिक पात्रों का रूप धारण कर धार्मिक प्रसंगों को पूरी निष्ठा के साथ जीवंत करते हैं।

कृष्ण लीला, विषहरी बांग्ला नाच, शिव लीला और भक्ति गाथाओं पर आधारित इन कार्यक्रमों के माध्यम से दर्शकों को स्वस्थ मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती लोकप्रियता ने स्थानीय कला मंडलियों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।

बिहार से लेकर बंगाल-झारखंड तक मांग; कठिन अभ्यास से मंच पर उतरते हैं कलाकार

अपनी कला और मंचन के अनुभवों को साझा करते हुए कलाकार नारायण साह, यशवंत साह, धनेश्वर ऋषि, सुफल सोरेन, फिलिप्स सिंह, कुलदीप शाह, छेदी साह और बबलू मंडल ने बताया कि वे बीते 8 से 10 वर्षों से पुरुष मंडली के साथ बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे राज्यों में जाकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

कलाकारों ने बताया कि किसी भी नाटक या रासलीला के मंचन से पूर्व वे कई दिनों तक कठिन अभ्यास (रियाज) करते हैं। संवाद अदायगी, पात्रों के अनुकूल भाव-भंगिमा, हंसने और रोने जैसे संवेदनात्मक भावों को स्वाभाविक रूप से उभारने के लिए विशेष तैयारी की जाती है, जिससे दर्शक मंच से सीधे जुड़ जाते हैं।

 

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