भागलपुर की लोककला को मिला बाजार, मंजूषा से सजे परिधानों की बढ़ी मांग, 200 महिलाओं को मिला रोजगार
दुर्गा पूजा और छठ महाव्रत में भागलपुर की मूल मंजूषा कला की विशेष झलक दिखेगी, जिसकी मांग बिहार से बाहर भी बढ़ रही है।
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एआई द्वारा जेनरेट इमेज।
HighLights
दुर्गा पूजा और छठ में दिखेगी मंजूषा कला की खास झलक।
अंग मालिनी संस्थान को दो लाख रुपये के ऑर्डर मिले।
150-200 महिलाएं मंजूषा कला से जुड़कर रोजगार पा रही हैं।
जागरण संवाददाता, भागलपुर। दुर्गा पूजा और छठ महाव्रत में इस बार भागलपुर की मूल मंजूषा कला की खास झलक देखने को मिलेगी।
मंजूषा लोककला से सजे परिधानों की मांग अब बिहार से बाहर भी बढ़ रही है। अंग मालिनी संस्थान को प्रयागराज, दिल्ली और कोलकाता से करीब दो लाख रुपये के ऑर्डर मिले हैं।
संस्थान से जुड़े हेमंत ने बताया कि त्योहारों को लेकर मूल मंजूषा से तैयार परिधानों की मांग लगातार बढ़ रही है। सैंपल पसंद किए जाने के बाद मिले ऑर्डर से कलाकारों में खासा उत्साह है।
उन्होंने बताया कि मूल मंजूषा की पारंपरिक शैली को आधुनिक परिधानों और उपयोगी वस्तुओं से जोड़ा जा रहा है। साड़ी, गमछा, दुपट्टा, सूट, बैग सहित अन्य वस्तुओं पर मंजूषा के पारंपरिक रंगों और प्रतीकों को उकेरा जा रहा है।
इस काम से चंपानगर की करीब 150 से 200 महिलाएं जुड़ी हैं। लोककला को बाजार मिलने के साथ महिला कलाकारों के लिए रोजगार का रास्ता भी खुला है।
वहीं, सुदर्शन झा ने बताया कि मूल मंजूषा में पारंपरिक रूप से भगवान भास्कर की किरणों और प्रकृति से जुड़े पांच रंगों का विशेष महत्व माना जाता है।
इन रंगों और प्रतीकों को शुभता एवं मंगल से जोड़ा जाता है। उनका कहना है कि धार्मिक एवं सांस्कृतिक अवसरों पर मूल मंजूषा से सजे परिधान पहनने की परंपरा बढ़ने से लोककला को नई पीढ़ी से जोड़ने में मदद मिलेगी।
